क़ादियान

अहमदिया मुस्लिम जमाअत के लिए आध्यात्मिक जन्म और भाईचारे का एक पवित्र स्थान

क़ादियान का इतिहास

क़ादियान अमृतसर के उत्तर पूर्व में ज़िला गुरदासपुर का एक गाँव और नगरपालिका परिषद है जो कि बटाला शहर से 18 किलोमीटर उत्तर पूर्व में पंजाब राज्य के अंतर्गत भारत में स्थित है।

क़ादियान अमृतसर के उत्तर पूर्व में, ज़िला गुरदासपुर का एक गाँव और नगरपालिका परिषद है जोकि बटाला शहर से 18 किलोमीटर उत्तर पूर्व में पंजाब राज्य के अंतर्गत भारत में स्थित है।

क़ादियान की नींव हिन्दुस्तान के एक मुसलमान शासक, बाबर (1483-1530) के शासनकाल में, 1530 में तब पड़ी थी, जब समरकंद से आने वाले बर्लास मग़लूब के एक सरदार, मिर्ज़ा हादी बेग साहब अपने परिवार और 200 साथियों के साथ हिंदुस्तान में आए थे। देहली जाने के बाद वह पंजाब के माझा के एक गैर आबाद और वीरान क्षेत्र में आबाद हो गए, जो कि लाहौर से 70 मील पूर्व में (जो आज पाकिस्तान के पूर्वी किनारे पर स्थित है)। उन्हें 200 से अधिक गाँवों के दायरे के अधिकार पर काज़ी निर्धारित किया गया इसके बाद आने वाली कई सदियों के बाद उस गाँव का नाम माझा (माझ, पानी की भेंस से संबंधित) से इस्लामपुर, से इस्लामपुर काज़ी माझी इस से काज़ी माझी और अंततः क़ादियान हो गया, अर्थात क़ाज़ियों (शरीअत की शिक्षा के अनुसार निर्णय करने वालों)का एक गाँव।

यह क़स्बा लगभग 200 गाँवों के एक छोटे से राज्य की राजधानी था। समय के साथ-साथ यह पारिवारिक राज्य कमज़ोर होता गया और अंततः मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के पड़दादा मिर्ज़ा गुल मुहम्मद साहब के समय में इस के अधिकार का दायरा केवल 80-85 गाँव तक सिमित हो गया।

इसके पश्चात् राम गढ़िया सिक्खों ने 1802 ई० में इस क़स्बे पर क़ब्ज़ा कर लिया और इसी गाँव के ख़ानदान वालों को इस शहर से निकाल दिया गया था और उन्होंने पंजाब के राज्य में आश्रय प्राप्त किया।

रंजीत सिंह ने रामगढ़ियों को पराजित किया और 1816 ई० के बाद इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया। वह1833-35 के आस-पास उन्हें वापस ले आया और उसने कुछ गाँव इस ख़ानदान को वापिस दे दिए।

अल्लाह के नबी का जीवन और निधन

हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद साहब अलैहिस्सलाम इस ख़ानदान में 1835 ई० में पैदा हुए। आप बचपन से ही अपना अधिकतर समय अल्लाह की इबादत करने और स्वयं इस्लाम के बारे में ज्ञान प्राप्त करने में व्यतीत करते थे।

आप अलैहिस्सलाम एक ऐसे युग में आए थे जब न केवल मुसलमान अपितु संसार के समस्त बड़े धर्म एक महान मुक्ति दाता के आगमन की प्रतीक्षा में आसमान की ओर देख रहे थे जिस के बारे में उन्हें सदियों पहले वचन दिया गया था। मुसलमान हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और महदी की वापसी के प्रतीक्षक थे ताकि वह इस्लाम के गौरव के लिए और उसके खोए हुए पहले सम्मान को वापिस लाने के लिए उनके साथ सम्मिलित हो जाएं। इस युग की सब से अधिक जनसंख्या वाले और राजनीतिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली, ईसाइयत के अनुयायी, ईसा अलैहिस्सलाम की वापसी की आशा कर रहे थे कि वह वापस आ कर ईमान लाने वालों को धन प्रदान करें और काफ़िरों को समाप्त करें। इसी प्रकार हिन्दू भी अपने कृष्ण जी महाराज की प्रतीक्षा कर रहे थे। आश्चर्य की बात यह है कि इन समस्त विरोधी धर्मों ने अपने ग्रन्थों से अपने मुक्ति दाता के आगमन के लिए एक ही समय का निर्धारण कर रखा था।

अल्लाह तआला ने संसार के इतिहास के अंतिम हज़ार वर्षीय दौर में संसार का आध्यात्मिक रूप से मार्गदर्शन करने के लिए हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के सच्चे सेवक का चयन कर के अपने वादे को पूरा कर दिया।

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हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद, मसीह मौऊद और महदी अलैहिस्सलाम

क़ादियान का महत्व

क़ादियान अहमदिया मुस्लिम जमाअत के संस्थापक हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद, मसीह मौऊद और महदी का जन्म स्थान होने के कारण अत्यंत पवित्र तथा महत्वपूर्ण है जो सम्पूर्ण मुस्लिम दुनिया और अन्य पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है कि वे प्रत्येक वर्ष अपने पवित्र स्थानों की यात्रा के लिए यहाँ आएं जहाँ पर मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण ख़ुदा की याद और इबादत में व्यतीत किया और जहाँ आप अलैहिस्सलाम ने विशेष मुकालमा (ख़ुदा से वार्तालाप)का सौभाग्य प्राप्त किया और इल्हाम के फल आपको मिले।

यहाँ की इमारतें अत्यंत सुन्दर और मन को मोह लेने वाली हैं। इन बिल्डिंग्स को उच्च कोटि की ईंटों तथा अन्य सामाग्री से बनाया गया था विशेष रूप से मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के घर (दारुल मसीह) के भीतरी भाग को, और यह इमारतें आज भी केवल सामान्य सी अपग्रेड, मुरम्मत और देख-भाल के  अतिरिक्त अधिकतर अपनी वास्तविक अवस्था और रूप में खड़ी हैं।

जमाअत अहमदिया के आरंभिक इतिहास का एक बहुत बड़ा भाग जिनमें सम्मुख आने वाली परीक्षाओं और कठिनाइयों, ख़ुशियों और सफ़लताओं और मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की सच्चाई के पलों की यादें इन बिल्डिंग्स के आस-पास घूमती हैं। जिस में दारुल मसीह (मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम का निवास स्थान), मस्जिद अक़्सा, मस्जिद मुबारक, दारुल रियाज़त (इबादत का स्थान) और बैतुद्दुआ (नमाज़ का घर) इत्यादि सम्मिलित हैं।

इसके अतिरिक्त इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की उस हदीस से भी क़ादियान शहर के महत्व में बढ़ोतरी होती है जिस में इस का नाम भी लिया गया है जैसे कि भविष्यवाणी की गई है कि :

 रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: महदी क़रिया नामक बस्ती से प्रदर्शित होगा(बिहारुल अनवार जिल्द 13 पृष्ठ 33)

मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम का लंगर ख़ाना

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम अपनी पुस्तक फ़तेह इस्लाम में इस्लाम के प्रचार-प्रसार की पांच शाखाओं को वर्णन करते हुए तीसरी शाखा के बारे में लिखते हैं :

तीसरी शाखा इस कारख़ाने वे लोग हैं जो सत्य की खोज के लिए यात्रा करने वाले और विभिन्न उद्देश्यों से आने वाले हैं जो इस ख़ुदाई सिलसिले की सूचना प्राप्त कर अपनीअपनी नीयतों की तहरीक से मुलाक़ात के लिए आते रहते हैं। यह शाखा भी निरंतर फलफूल रही है। यद्यपि कुछ दिनों में कम परन्तु कुछ दिनों में बहुत अधिकता से इसका सिलसिला आरंभ हो जाता है। अतः इन चार वर्षों में साठ हज़ार से कुछ अधिक अतिथि आए होंगे और उन में से सक्रिय लोगों को भाषणों के माध्यम से, लाभ पहुँचाया गया और उनकी समस्याओं का समाधान किया गया और उनकी कमज़ोरी को दूर कर दिया गया इसका ज्ञान ख़ुदा तआला को है।(फतह इस्लाम, रूहानी खज़ायन जिल्द तृतीय पृष्ठ  14,15)

“दारुल ज़ियाफ़त” (महमान-ख़ाना) जिस महान उद्देश्य के लिए स्थापित किया गया था वह यह था कि वे लोग जो सच्चाई की तलाश में और ऐसे लोग जो विभिन्न कारणों के आधार पर क़ादियान की ओर यात्रा करें उन लोगों के रहने के लिए उचित प्रबन्ध मौजूद रहे, और वे किसी भी प्रकार कठिनाई का सामना न करें। हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम को मेहमान नवाज़ी (अतिथि सत्कार) से बहुत प्रेम था इसी उद्देश्य से आपने लंगर ख़ाना की स्थापना की जिसमें मेहमानों के रहने का प्रबंध किया जाता है और यहाँ उनके लिए निःशुल्क मेहमान नवाज़ी का प्रबंध किया जाता है। साथ ही कई ग़रीब लोगों को मुफ़्त खाना दिया जाता है। आज भी क़ादियान में दारुल ज़ियाफ़त प्रत्येक वर्ष हज़ारों अतिथियों का स्वागत करता है।

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने मेहमान नवाज़ी पर बहुत बल दिया है। इसलिए जैसे-जैसे यह जमाअत पूरी दुनिया में बड़ी संख्या में फैली, इसके अधिकतर मिशन हाउसेस में एक छोटा सा कम्युनिटी किचन भी था जो जमाअत के मेहमानों का अतिथि सत्कार करता है।

बहिश्ती मक़बरा (क़ादियान में जन्नतियों का क़ब्रिस्तान)

1905 के अंत में हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम को बड़ी संख्या में ऐसे इल्हाम (ईशवाणी) होने लगे जिन से यह प्रदर्शित होता था कि आप की मृत्यु निकट है। हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने “अलवसीयत” के नाम से एक” वसीयत”प्रकाशित की और अपनी मृत्यु के बारे में समस्त इल्हाम प्रकाशित किए। इस “वसीयत” में हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से मार्गदर्शन प्राप्त कर एक विशेष क़ब्रिस्तान की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा, जिसे उन्होंने  ” बहिश्ती मक़बरा” (आसमानी क़ब्रिस्तान) के नाम से नामित किया।

वास्तव में इस क़ब्रिस्तान के बारे में हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने कई वर्ष पहले एक स्वप्न देखा था जिस में अल्लाह तआला ने हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम को बताया था कि जमाअत के शुद्ध और नेक लोगों के लिए अलग क़ब्रिस्तान स्थापित किया जाना चाहिए जो अल्लाह तआला के निकट मुबारक हैं ताकि यह अहमदियों की आने वाली नस्लों के लिए एक यादगार बने जिससे कि वे अपने ईमान को ताज़ा करते रहें। हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम एक लम्बे समय से क़ब्रिस्तान की ज़मीन और इसके स्थान के बारे में सोच रहे थे। फिर जब हज़रत मौलवी अब्दुल करीम साहब सियाल्कोटी मृत्यु को प्राप्त हो गए और इसी दौरान आप अलैहिस्सलाम को अपनी मौत के बारे में बहुत से इल्हाम होने लगे तो हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने इस आकाशीय क़ब्रिस्तान के प्रस्ताव को पूर्ण करने के लिए व्यवहारिक क़दम उठाए। हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने क़ादियान के दक्षिण में अपने ख़ानदानी बाग़ से जुड़ी हुई ज़मीन का एक टुकड़ा चयनित किया और “बहिश्ती मक़बरा” की स्थापना की। इसी बीच हज़रत मौलवी अब्दुल करीम साहब की लाश, जिसे अस्थायी रूप से एक ताबूत में रख कर किसी और स्थान पर दफ़न किया गया था, को बहिश्ती मक़बरा में स्थानांतरित कर दिया गया। इस प्रकार हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के जीवन में ही क़ादियान में बहिश्ती मक़बरा (आकाशीय क़ब्रिस्तान) का आरंभ हुआ।

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की नमाज़-ए-जनाज़ा बहिश्ती मक़बरा के एक मैदान में पढ़ी गई और आप अलैहिस्सलाम को इसी क़ब्रिस्तान में दफ़न किया गया। हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के बहुत से सहाबा (साथी) और शेष लोग इस आकाशीय क़ब्रिस्तान में दफ़न हैं।

राष्ट्रीय मुख्यालय (नेशनल हेडक्वाटर)

क़ादियान, हिंदुस्तान के अहमदियों के लिए केंद्र के रूप में भी सेवाएं प्रदान करता है। जमाअत के मेंबरों की आध्यात्मिक तथा शारीरिक उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से जलसों का आयोजन किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त सदर अंजुमन अहमदिया जोकि जमाअत के राष्ट्रीय प्रबंध की देख-रेख करने के लिए एक केन्द्रीय अहमदिया कौंसिल है, तहरीक-ए-जदीद अहमदिया और वक्फ़-ए-जदीद अहमदिया की कौंसिल के साथ क़ादियान में ही उपस्थित है इसी प्रकार जमाअत के अंदर शेष सभी सहायकीय तंज़ीमों का राष्ट्रीय प्रबन्धन भी यहाँ ही उपस्थित है।

इसके अतिरिक्त अहमदिया मुस्लिम जमाअत का सालाना जलसा (वार्षिक सम्मेलन) जिसकी स्थापना स्वयं हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने की है, वह भी वर्णन योग्य है। सामान्य रूप से यह जलसा शुक्रवार के दिन ख़ुत्बा जुमा से आरंभ हो कर तीन दिन तक चलता है। जिसका उद्देश्य यह है कि विशेष रूप से अहमदी मुसलमान और सामान्य रूप से शेष जनता इस जलसा सालाना को आध्यात्मिक और शिष्टाचार संबंधी उन्नति, लाभकारी समाजिक मेल-जोल और सबसे बढ़ कर ख़ुदा से निजी संबंध को बढ़ाने का एक माध्यम बनाएं।