महिलाओं के ‘मासिक धर्म’ के दौरान उनका मस्जिद में आना?

08 मार्च, 2021

प्रश्न– एक स्त्री ने महिलाओं के ‘मासिक धर्म’ के दौरान उनके मस्जिद में आने के बारे में विभिन्न हदीसों तथा वर्तमान समय में महिलाओं को मासिक धर्म में अपनी सफाई इत्यादि के लिए उपलब्ध आधुनिक सामग्रियों के वर्णन पर आधारित, एक नोट हुज़ूर अनवर की सेवा में प्रस्तुत करके मस्जिद में होने वाली जमाअती मीटिंग्स तथा सभाओं इत्यादि में ऐसी महिलाओं के सम्मिलित होने और ऐसी गैर मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद का विज़िट आदि करवाने के बारे में हुज़ूर अनवर अय्यदहुल्लाह तआला से मार्गदर्शन चाहा। जिस पर हुज़ूर अनवर ने अपने पत्र दिनांक 14 मई 2020 ई में निम्नलिखित उत्तर दिया।


उत्तर– मासिक धर्म वाली महिलाओं के मस्जिद में से कोई वस्तु लाने या मस्जिद में छोड़कर आने और मस्जिद में जाकर बैठने के बारे में भिन्न-भिन्न आदेश बड़े विस्तार से हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने हमें समझा दिए हैं। अतः जैसा कि आपने अपने पत्र में भी लिखा है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी पत्नियों को इस अवस्था में चटाई आदि बिछाने के लिए मस्जिद में जाने की अनुमति प्रदान किया करते थे परंतु जहां तक इस हालत में मस्जिद में जाकर बैठने का संबंध है तो इस बारे में भी हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की निषेद्यादेश बड़ी स्पष्टता के साथ हदीसों में वर्णित हैं। अतः हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ईदों के अवसर पर कुंवारी लड़कियों, व्यस्क और पर्दा वालियों और मासिक धर्म से ग्रस्त इत्यादि समस्त प्रकार की स्त्रियों को ईद के लिए जाने का विशेष निर्देश दिया, यहां तक कि ऐसी स्त्री जिसके पास ओढ़नी न हो उसे भी कहा कि वह अपनी किसी बहन से अस्थाई रूप से ओढनी लेकर जाए, परंतु साथ ही मासिक धर्म से ग्रस्त स्त्रियों के लिए यह भी निर्देश दिया कि वह नमाज़ के स्थान से अलग रह कर दुआ में सम्मिलित हों।


इसी प्रकार हज्जतुल विदा (हुज़ूर स अ व के अंतिम हज) के अवसर पर जब हज से पहले अन्य मुसलमान उमरा कर रहे थे, हजरत आयशा रजि अल्लाह अन्हा अपने मासिक धर्म की अवस्था में थीं तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें उमरा की अनुमति न दी क्योंकि तवाफ (खाना काबा की परिक्रमा) करने के लिए मस्जिद में अधिक समय तक रहना पड़ता है। फिर जब वह मासिक धर्म से पवित्र हो गईं तो हज के बाद उन्हें अलग से उमरा के लिए भिजवाया। अतः हदीसों में इतने विस्तार पूर्वक वर्णन के बाद कोई कारण शेष नहीं रह जाता कि हम अपनी इच्छाओं के अनुसार नए-नए मार्ग तलाश करें।


जहां तक इस बात का संबंध है कि पहले समय में औरतों को इन दिनों में अपनी सफाई के लिए ऐसी आधुनिक सामग्रियां उपलब्ध न थीं जैसी अब हैं, तो ठीक है ऐसी आधुनिक सामग्रियां उपलब्ध न थीं परंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे अपनी सफाई का ध्यान ही नहीं रख सकती थीं और उनके मासिक धर्म का रक्त इधर-उधर गिरता-पड़ता था। मनुष्य ने हर दौर में अपनी आवश्यकताओं के लिए उत्तम से उत्तम प्रबंध करने के लिए प्रयास किया है अतः पहले ज़माने में भी औरतें अपनी सफाई-सुथराई का उत्तम प्रबंध किया करती थीं।


फिर इस आधुनिक समय की सफाई संबंधी सामग्रियों में भी कुछ दोष मौजूद हैं, ऐसी महिलाएं जिन को बहुत अधिक रक्तस्राव होता है कभी-कभी उनका पैड लीक (Leak) कर जाने के कारण कपड़े ख़राब हो जाते हैं।


अतः इस्लाम की जो शिक्षाएं शाश्वत और हर ज़माने के लिए समान हैं उन का हर ज़माने में उसी प्रकार पालन होगा जिस प्रकार आंहुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के ज़माने में होता था।
यदि किसी स्थान पर मजबूरी है और नमाज़ के लिए कमरे के अतिरिक्त और कोई स्थान नहीं, तो उसी कमरे के अंत में दरवाज़े के निकट एक ऐसा स्थान निर्धारित किया जा सकता है जहां नमाज़ न पढ़ी जाए और ऐसी महिलाएं वहां बैठ जाया करें या मस्जिद के अंतिम भाग में ऐसी महिलाओं के लिए कुर्सियां रखकर उनके बैठने का प्रबंध कर दिया जाए ताकि नमाज़ पढ़ने के स्थान के गंदा होने का तनिक भी सन्देह न रहे।


जहां तक गैर मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में विज़िट करने की बात है तो सर्वप्रथम तो विज़िट के दौरान उन्हें मस्जिदों में बैठाया नहीं जाता बल्कि केवल मस्जिद का विज़िट कराया जाता है जिसका समय लगभग उतना ही होता है जितना कि मस्जिद से चटाई उठा कर लाने या बिछा कर आने के बीच का समय। परंतु यदि कहीं उन्हें मस्जिद में बैठाने की आवश्यकता पड़े तो सफ़ों पर नमाज़ पढ़ने के स्थान पर नीचे बैठाने की बजाय मस्जिद के अंत में कुर्सियों पर उन्हें बैठाएं।

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