ख़िलाफ़त

ख़ुदा की दूसरी क़ुदरत

अल्लाह ने तुम में से उन लोगों से वादा किया है जो ईमान लाए और जिन्होंने नेक काम किए कि वह ज़रूर उन्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) बनाएगा, जैसा कि उसने उनसे पहले के लोगों को ख़लीफ़ा बनाया था; और वह ज़रूर उनके लिए उनके उस धर्म को सुदृढ़ कर देगा जिसे उसने उनके लिए पसंद किया है; और वह ज़रूर उनके भय के बाद उसके बदले में उन्हें शांति और सुरक्षा प्रदान करेगा: वे मेरी ही इबादत करेंगे और मेरे साथ किसी चीज़ को साझीदार नहीं ठहराएँगे। फिर जो कोई इसके बाद कृतघ्न होगा, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी होंगे।

सूरह अन-नूर, आयत 56

‘ख़िलाफ़त’ शब्द का अर्थ उत्तराधिकार है, और ‘ख़लीफ़ा’ ईश्वर के पैग़ंबर का वह उत्तराधिकारी होता है जिसका उद्देश्य सुधार और नैतिक प्रशिक्षण के उन कार्यों को पूर्णता तक पहुँचाना है जिनका बीजारोपण पैग़ंबर द्वारा किया गया था। किसी पैग़ंबर के अनुयायियों का समुदाय ख़िलाफ़त की बरकत के अधीन ही अपने विश्वास और आचरण को निरंतर परिपक्व करता है। अल्लाह पवित्र क़ुरआन में फ़रमाता है:

“अल्लाह ने तुम में से उन लोगों से वादा किया है जो ईमान लाए और जिन्होंने नेक काम किए कि वह ज़रूर उन्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) बनाएगा, जैसा कि उसने उनसे पहले के लोगों को ख़लीफ़ा बनाया था; और वह ज़रूर उनके लिए उनके उस धर्म को सुदृढ़ कर देगा जिसे उसने उनके लिए पसंद किया है; और वह ज़रूर उनके भय के बाद उसके बदले में उन्हें शांति और सुरक्षा प्रदान करेगा: वे मेरी ही इबादत करेंगे और मेरे साथ किसी चीज़ को साझीदार नहीं ठहराएँगे। फिर जो कोई इसके बाद कृतघ्न होगा, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी होंगे।”

सूरह अन-नूर (24:56)

अतः, जिस प्रकार अल्लाह किसी पैग़ंबर को नियुक्त करता है, उसी प्रकार ख़लीफ़ा की नियुक्ति भी वही करता है। वह उस व्यक्ति को चुनता है जो ख़लीफ़ा बनने के सबसे योग्य हो, और सच्चे व नेक मोमिनों के एक समूह का मार्गदर्शन करता है ताकि ख़लीफ़ा के चयन की प्रक्रिया के माध्यम से उसकी इच्छा प्रकट हो सके। इस प्रकार, प्रत्यक्ष रूप से भले ही ऐसा प्रतीत हो कि ख़लीफ़ा को लोगों के एक समूह द्वारा चुना गया है, परंतु वास्तव में यह अल्लाह की ही मर्ज़ी होती है जो उनकी बुद्धि व संकल्प को अपनी पसंद का ख़लीफ़ा चुनने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है।

ख़िलाफ़त-ए-राषिदा — सत्यनिष्ठ ख़िलाफ़त

पवित्र क़ुरआन की उपरोक्त आयत में उल्लिखित ईश्वरीय वादे के आलोक में, पवित्र पैग़ंबर (स.) ने अपने अनुयायियों के बीच एक आध्यात्मिक नेतृत्व प्रणाली की स्थापना की शुभ सूचना दी थी। आपने फ़रमाया:

“तुम्हारे बीच नुबुव्वत (पैग़ंबरी) तब तक रहेगी जब तक अल्लाह चाहेगा। फिर वह इसका अंत कर देगा और उसके बाद नुबुव्वत की पद्धति पर ख़िलाफ़त स्थापित होगी।”

मिश्कात अल-मसाबीह, किताब अर-रिक़ाक़

आपने आगे फ़रमाया:

ऐ अल्लाह, मेरे उन उत्तराधिकारियों पर दया फ़रमा जो मेरे बाद आएँगे, जो मेरी बातों और मेरी सुन्नत को बयान करेंगे और लोगों को उसकी शिक्षा देंगे।”

जामे अस-सग़ीर, खंड 1, पृ. 60

ये दोनों रिवायतें इस मूलभूत सिद्धांत को स्पष्ट करती हैं कि ख़िलाफ़त मूलतः पैग़ंबर के मिशन की ही निरंतरता है और ख़िलाफ़त तथा नुबुव्वत के उद्देश्य व लक्ष्य एक ही हैं।

ख़िलाफ़त-ए-राषिदा के महत्व पर बल देते हुए पवित्र पैग़ंबर (स.) ने फ़रमाया:

“तुम मेरी सुन्नत और मेरे बाद हिदायत पाए हुए खुलफ़ा-ए-राषिदीन (सत्यनिष्ठ ख़लीफ़ाओं) के तरीक़े का दृढ़ता से पालन करना।”

सुनन अत-तिरमिज़ी, किताबुल इल्म

इन स्पष्ट व्याख्याओं से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया कि पवित्र पैग़ंबर (स.) के निधन के बाद ख़िलाफ़त की एक व्यवस्था स्थापित होने वाली थी और कुछ महान हस्तियाँ इस व्यवस्था के आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में सामने आने वाली थीं।

ठीक ऐसा ही हुआ। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.), हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब (रज़ि.), हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान (रज़ि.) और हज़रत अली बिन अबी तालिब (रज़ि.) एक के बाद एक ख़लीफ़ा चुने गए। उनकी ख़िलाफ़त की कुल अवधि लगभग तीस वर्ष रही। ख़िलाफ़त के इस कालखंड को सामान्यतः ‘ख़िलाफ़त-ए-राषिदा’ कहा जाता है।

हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) का मूल नाम अब्दुल्लाह था, लेकिन उनके पुत्र बक्र के नाम पर वे ‘अबू बक्र’ के नाम से जाने गए। उनके पिता अबू क़हाफ़ा और माता उम्मुल ख़ैर सलमा थीं। उनका जन्म 572 ईस्वी में मक्का में हुआ था। वे पवित्र पैग़ंबर (स.) के अत्यंत घनिष्ठ मित्र थे। पुरुषों में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पवित्र पैग़ंबर (स.) के दावे की सच्चाई की पुष्टि की और इसी कारण उन्हें ‘सिद्दीक़’ (परम सत्यवादी) की उपाधि मिली। मक्का से मदीना की हिजरत के दौरान वे पवित्र पैग़ंबर (स.) के साथ थे और ग़ारे-सौर (सौर की गुफा) में पैग़ंबर साहब (स.) के एकमात्र साथी थे जहाँ दोनों ने शरण ली थी।

पवित्र पैग़ंबर (स.) के देहांत के पश्चात हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) को पहले ख़लीफ़ा के रूप में चुना गया। उन्हें अचानक उपजी अत्यंत विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

पहली समस्या यह थी कि कुछ क़बीलों ने इस्लाम त्याग दिया, क्योंकि उनके क़बीलाई सरदारों ने पैग़ंबर साहब (स.) के उत्तराधिकारी के प्रति निष्ठावान रहना आवश्यक नहीं समझा। इतना ही नहीं, उन्होंने ख़िलाफ़त की नई व्यवस्था को समाप्त करने के लिए मदीना पर हमले की तैयारियाँ शुरू कर दीं। उनके इरादों को जानकर हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) ने सेना भेजी और उनके विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया।

हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) के सामने दूसरी बड़ी समस्या यह थी कि झूठी पैग़ंबरी का दावा करने वाले कई महत्वाकांक्षी लोगों ने इस्लामी राज्य के विरुद्ध बग़ावत कर दी। मुसैलमा कज़्ज़ाब और अल-असवद अल-अंसी ने बड़ी सेनाएँ एकत्र कीं और कई मुस्लिम क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) ने तुरंत इन झूठे दावेदारों का मुक़ाबला किया और सीमित संसाधनों के बावजूद अल्लाह ने उन्हें इन उपद्रवियों पर विजय प्रदान की।

उनकी ख़िलाफ़त की कई महान उपलब्धियों में से एक पवित्र क़ुरआन का एक स्थान पर संकलन था। यद्यपि पवित्र क़ुरआन का लेखन और क्रम-निर्धारण स्वयं पवित्र पैग़ंबर (स.) की देखरेख में पूरा हो चुका था, परंतु वह चमड़े के टुकड़ों, पत्तों और तख्तियों पर अलग-अलग लिखा हुआ था। हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) ने इन सभी लिखित अंशों को एक जगह एकत्र करवाया और क़ुरआन के संरक्षण के लिए हुफ़्फ़ाज़ (क़ुरआन कंठस्थ करने वालों) की व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया।

पंद्रह दिन बीमार रहने के बाद 23 अगस्त 634 ईस्वी को हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) का निधन हो गया। वे दो वर्ष से कुछ अधिक समय तक ख़लीफ़ा रहे।

हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब (रज़ि.) का जन्म 581 ईस्वी में मक्का में हुआ था और वे क़ुरैश के एक कुलीन परिवार से थे। वे एक विख्यात व्यापारी थे और सीरिया व इराक़ में व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व करते थे। जब पवित्र पैग़ंबर (स.) ने अपनी नुबुव्वत की घोषणा की, तो हज़रत उमर (रज़ि.) इस्लाम के कट्टर विरोधी बन गए, यहाँ तक कि एक दिन वे तलवार उठाकर पैग़ंबर साहब (स.) की हत्या के इरादे से घर से निकले। मार्ग में किसी ने उनसे कहा कि पहले अपनी बहन और बहनोई की ख़बर लें जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया है। वे सीधे उनके घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया; अंदर से पवित्र क़ुरआन की तिलावत की आवाज़ आ रही थी। इससे वे क्रोधित हो गए और अपने बहनोई को पीटने लगे, तथा बीच-बचाव करने आईं अपनी बहन को भी घायल कर दिया। घायल बहन ने दृढ़ स्वर में कहा, “उमर! तुम हमें जितना चाहो मार लो, लेकिन हम अपना ईमान नहीं छोड़ेंगे।” यह सुनकर वे शांत हुए और उन्होंने क़ुरआन का कुछ हिस्सा पढ़कर सुनाने को कहा। क़ुरआनी आयतों को सुनकर वे इतने भावुक हुए कि उनकी आँखों से आँसू बह निकले। वे सीधे पवित्र पैग़ंबर (स.) के पास पहुँचे और इस्लाम स्वीकार कर लिया। मक्का के एक शक्तिशाली, निडर और प्रभावशाली व्यक्ति होने के कारण उनका इस्लाम में आना मुसलमानों के लिए बड़ी ताक़त साबित हुआ।

हज़रत उमर इब्न अल-ख़त्ताब (रज़ि.) पवित्र पैग़ंबर (स.) के दूसरे ख़लीफ़ा थे। उनकी ख़िलाफ़त के दौरान मुसलमानों को ईरान, इराक़, सीरिया और मिस्र के ख़िलाफ़ कई लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं, जिसके परिणामस्वरूप इन देशों के विशाल क्षेत्र मुस्लिम शासन के अधीन आ गए। 17 हिजरी में जब बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम) फ़तह हुआ, तो रोमनों के अनुरोध पर हज़रत उमर (रज़ि.) ने स्वयं वहाँ की यात्रा की और मुसलमानों व यरूशलम के निवासियों के बीच एक ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर किए।

हज़रत उमर (रज़ि.) ने इस्लामी राज्य के लिए एक उत्कृष्ट प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की—जिसमें ख़लीफ़ा को सलाह देने के लिए ‘मजलिस-ए-शूरा’ का गठन, सुचारू शासन के लिए पूरे राज्य को प्रांतों में विभाजित करना, वित्त विभाग (बैतुल माल) की स्थापना, विभिन्न क्षेत्रों में स्कूलों व मस्जिदों का निर्माण और हिजरी कैलेंडर का आरंभ शामिल था।

हज़रत उमर (रज़ि.) अपनी प्रजा की भलाई को लेकर इतने चिंतित रहते थे कि वे रात में भेष बदलकर मदीना की गलियों में घूमते थे ताकि स्वयं देख सकें कि किसी को मदद की ज़रूरत तो नहीं है। एक रात गश्त के दौरान उन्होंने देखा कि एक महिला चूल्हे पर हाँडी चढ़ाए बैठी है और उसके बच्चे रो रहे हैं। पूछने पर पता चला कि बच्चे दो दिन से भूखे हैं और उन्हें बहलाने के लिए हाँडी में केवल पानी चढ़ा रखा है। वे तुरंत सरकारी ख़ज़ाने पहुँचे और स्वयं खाद्य सामग्री लादकर उस महिला तक पहुँचाई। जब उनके सेवक ने बोरी उठाने की पेशकश की, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया: “क्या क़ियामत के दिन तुम मेरा बोझ उठाओगे?” वह महिला, जिसने पहले कभी हज़रत उमर (रज़ि.) को नहीं देखा था, इतनी प्रसन्न हुई कि उसने दुआ देते हुए कहा, “अल्लाह तुम्हें उमर की जगह ख़लीफ़ा बनाए।” यह सुनकर हज़रत उमर (रज़ि.) रो पड़े और बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए।

644 ईस्वी (26 ज़िलहिज्जा, 23 हिजरी) में जब वे नमाज़ पढ़ा रहे थे, तब एक फ़ारसी दास ने उन पर ख़ंजर से हमला कर दिया। यह घाव जानलेवा साबित हुआ और 63 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे एक अद्वितीय ख़लीफ़ा थे जिनका शासनकाल निस्संदेह इस्लाम के इतिहास का स्वर्णिम युग था।

हज़रत उस्मान इब्न अफ़्फ़ान (रज़ि.) क़ुरैश के प्रसिद्ध घराने ‘बनू उमय्या’ से संबंधित थे। उनका वंश पाँचवीं पीढ़ी में पवित्र पैग़ंबर (स.) से जा मिलता है। ग़रीबों के प्रति उनकी दानशीलता इतनी विख्यात थी कि उन्हें ‘ग़नी’ (उदार/दानी) की उपाधि प्राप्त हुई।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) ने अपने घनिष्ठ मित्र हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) के प्रचार से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार किया। वे इस्लाम स्वीकार करने वाले चौथे व्यक्ति थे, परंतु उनके चाचा द्वारा उन पर कड़े अत्याचार किए गए। उन्होंने दो बार हिजरत की—पहले अबीसीनिया (हबशा) और फिर मदीना।

पवित्र पैग़ंबर (स.) हज़रत उस्मान (रज़ि.) का बहुत सम्मान करते थे और उन्होंने अपनी पुत्री हज़रत रुक़य्या (रज़ि.) का निकाह उनसे किया। उनके निधन के बाद पैग़ंबर साहब (स.) ने अपनी दूसरी पुत्री हज़रत उम्मे कुलसूम (रज़ि.) का निकाह भी हज़रत उस्मान (रज़ि.) से कर दिया। इसी कारण उन्हें ‘ज़ुन-नूरैन’ (दो नूरों वाला) कहा जाता है।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) पवित्र पैग़ंबर (स.) के तीसरे ख़लीफ़ा थे। उनकी ख़िलाफ़त में इस्लामी राज्य का और विस्तार हुआ। ईरान में हुए विद्रोह को कुचला गया और उत्तर में रोमन सेनाओं को पुनः पराजित किया गया। इन विजयों के परिणामस्वरूप संपूर्ण ईरान, एशिया माइनर और मिस्र मुस्लिम नियंत्रण में आ गए।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की प्रमुख उपलब्धियों में से एक यह थी कि उन्होंने अनुभव किया कि ग़ैर-अरब मुसलमानों को पढ़ने और समझने में कठिनाई न हो, इसके लिए क़ुरआन का एक प्रामाणिक पाठ (Standard Orthography) होना चाहिए। अतः उन्होंने हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) द्वारा संकलित मूल प्रति से पवित्र क़ुरआन की प्रतियाँ तैयार करवाईं और विभिन्न क़बीलाई शैलियों में लिखी अन्य व्यक्तिगत प्रतियों को नष्ट करवा दिया।

उनकी ख़िलाफ़त के अंतिम छह वर्ष अब्दुल्लाह बिन सबा (एक यहूदी जिसने इस्लामी राज्य को कमज़ोर करने के इरादे से इस्लाम का चोला ओढ़ा था) जैसे उपद्रवी समूहों के षड्यंत्रों के कारण अशांति और संघर्ष में बीते।

17 जून 656 ईस्वी को 82 वर्ष की आयु में, जब वे पवित्र क़ुरआन की तिलावत कर रहे थे, हज़रत उस्मान (रज़ि.) को शहीद कर दिया गया। उन्होंने इस्लाम के व्यापक हित और ख़िलाफ़त की गरिमा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

हज़रत अली (रज़ि.) पवित्र पैग़ंबर (स.) के चाचा अबू तालिब के पुत्र थे। उनका जन्म पवित्र पैग़ंबर (स.) के जन्म के लगभग बीस वर्ष बाद मक्का में हुआ था। हज़रत अली (रज़ि.) के जन्म के समय अबू तालिब की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमज़ोर होने के कारण स्वयं पैग़ंबर साहब (स.) ने उनके पालन-पोषण का दायित्व लिया।

हज़रत अली (रज़ि.) एक अत्यंत साहसी और कुशल योद्धा थे। उन्होंने पवित्र पैग़ंबर (स.) के साथ लगभग सभी लड़ाइयों में भाग लिया। उनका निकाह पवित्र पैग़ंबर (स.) की सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा (रज़ि.) से हुआ था।

हज़रत उस्मान (रज़ि.) की शहादत के बाद चौथे ख़लीफ़ा चुने जाने के तुरंत बाद, हज़रत अली (रज़ि.) ने मुस्लिम राज्य की राजधानी को मदीना से इराक़ के कूफ़ा शहर में स्थानांतरित कर दिया, जो भौगोलिक दृष्टि से अधिक केंद्रीय स्थान था। ख़लीफ़ा बनने के बाद उनके सामने हज़रत तल्हा (रज़ि.) और हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) जैसे प्रमुख सहाबा सहित आम मुसलमानों की यह माँग आई कि हज़रत उस्मान (रज़ि.) के हत्यारों को तुरंत दंडित किया जाए।

हज़रत अली (रज़ि.) ने स्पष्ट किया कि उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता राज्य में कानून-व्यवस्था बहाल करना है, जिसके बाद ही हत्यारों को न्याय के कटघरे में लाया जा सकता है। परंतु हज़रत तल्हा (रज़ि.) और हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) इससे सहमत नहीं हुए। हज़रत आयशा (रज़ि.) भी वास्तविक स्थिति से पूरी तरह अवगत न होने के कारण उनके साथ सम्मिलित हो गईं। अब्दुल्लाह बिन सबा के नेतृत्व वाले मुनाफ़िक़ों (कपटी गिरोह) ने, जो हज़रत उस्मान (रज़ि.) की हत्या में शामिल थे, इस स्थिति का लाभ उठाया और मतभेदों को भड़काया। इसके परिणामस्वरूप हज़रत आयशा (रज़ि.), हज़रत तल्हा (रज़ि.) और हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) बसरा की ओर बढ़े। स्थिति को देखते हुए हज़रत अली (रज़ि.) भी सेना सहित बसरा पहुँचे।

हज़रत अली (रज़ि.) ने विरोधी पक्ष के पास अपना दूत भेजा और बातचीत की। दोनों पक्षों में सहमति बन गई कि किसी भी तरह के रक्तपात को टाला जाए और कानून का शासन स्थापित होने दिया जाए ताकि दोषियों को सज़ा दी जा सके।

इस समझौते की सूचना से दोनों पक्षों में मौजूद मुनाफ़िक़ घबरा गए। उन्होंने गुप्त रूप से मिलकर युद्ध भड़काने का षड्यंत्र रचा। उन्होंने हज़रत ज़ुबैर (रज़ि.) की हत्या कर दी (जिन्होंने हज़रत अली (रज़ि.) के समक्ष अपनी भूल स्वीकार कर युद्ध से हटने का निर्णय ले लिया था)। हज़रत तल्हा (रज़ि.) को भी एक अन्य व्यक्ति द्वारा शहीद कर दिया गया। षड्यंत्रकारियों ने हज़रत आयशा (रज़ि.) के ऊँट पर भी हमला किया; जब ऊँट घायल होकर गिरा, तब जाकर युद्ध रुका। हज़रत अली (रज़ि.) ने हज़रत आयशा (रज़ि.) का पूरा सम्मान किया और उनके भाई के संरक्षण में उन्हें सकुशल मदीना पहुँचाया।

जंगे-जमल के बाद हज़रत अली (रज़ि.) ने अमीर मुआविया (रज़ि.) से बैअत करने का आग्रह किया, परंतु वे पहले हज़रत उस्मान (रज़ि.) के ख़ून का बदला लेने की माँग पर अड़े रहे। इसके बाद दोनों के बीच संघर्ष हुआ जो इस समझौते पर समाप्त हुआ कि मामला एक मध्यस्थता समिति (Arbitration) द्वारा तय किया जाएगा; परंतु यह प्रयास भी असफल रहा।

लोगों का एक बड़ा समूह जो मध्यस्थता के विरुद्ध था, हज़रत अली (रज़ि.) से अलग हो गया और उन्होंने अपना अलग नेता चुन लिया; इन्हें ‘ख़ारिजी’ (अलग होने वाले) कहा गया। हज़रत अली (रज़ि.) ने उन्हें समझाने का प्रयास किया परंतु वे नहीं माने, जिसके कारण एक भीषण युद्ध हुआ जिसमें कई ख़ारिजी मारे गए।

बाद में, जब हज़रत अली (रज़ि.) नमाज़ के लिए मस्जिद जा रहे थे, तब एक ख़ारिजी ने उन पर घातक हमला कर दिया। दो दिन बाद, 20 रमज़ान 40 हिजरी को यह महान और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व शहादत पा गया।

ख़िलाफ़त-ए-अहमदिया

पवित्र पैग़ंबर (स.) ने जहाँ अपने देहांत के तुरंत बाद स्थापित होने वाली ख़िलाफ़त-ए-राषिदा की सूचना दी थी, वहीं उन्होंने आख़िरी ज़माने में नुबुव्वत की पद्धति पर पुनः ख़िलाफ़त की पुनर्स्थापना की भी शुभ सूचना दी थी। आपने फ़रमाया:

“तुम्हारे बीच नुबुव्वत तब तक रहेगी जब तक अल्लाह चाहेगा। फिर वह इसका अंत कर देगा। फिर नुबुव्वत की पद्धति पर ख़िलाफ़त स्थापित होगी और तब तक रहेगी जब तक अल्लाह चाहेगा। फिर वह इसका भी अंत कर देगा। इसके बाद दमनकारी राजशाही आएगी [जो अपनी प्रजा पर भीषण कष्ट ढाएगी]। इसका शासन तब तक रहेगा जब तक अल्लाह चाहेगा। फिर अल्लाह इसका अंत कर देगा। इसके बाद निरंकुश तानाशाही आएगी। उनका शासन तब तक रहेगा जब तक अल्लाह चाहेगा। फिर अल्लाह इसका भी अंत कर देगा। इसके बाद पुनः नुबुव्वत की पद्धति पर ख़िलाफ़त स्थापित होगी।” इसके बाद पवित्र पैग़ंबर (स.) मौन हो गए।”

मिश्कात अल-मसाबीह, किताब अर-रिक़ाक़

इससे स्पष्ट होता है कि पवित्र क़ुरआन में प्रतिज्ञा की गई ख़िलाफ़त मूलतः एक स्थायी ईश्वरीय वरदान है, परंतु इसे सच्चे ईमान और सत्कर्मों से सशर्त बनाया गया था। ख़िलाफ़त के पहले दौर के अंत में, आवश्यक शर्तों के अभाव और नैतिक पतन के कारण यह नेमत एक प्रकार से लोगों से उठा ली गई। इसके बाद इस्लामी इतिहास ठीक उसी क्रम में आगे बढ़ा जैसा कि हदीस में बताया गया था—दमनकारी हुकूमतें आईं और गईं; वंशानुगत राजशाही और मुस्लिम साम्राज्य स्थापित हुए और मिट गए।

“दूसरी क़ुदरत का ज़हूर तब तक नहीं हो सकता जब तक मैं न जाऊँ, और जब मैं चला जाऊँगा तब ख़ुदा तुम्हारे लिए दूसरी क़ुदरत भेजेगा जो हमेशा तुम्हारे साथ रहेगी। इसलिए तुम्हारे लिए ज़रूरी है कि तुम मेरे जाने का दिन देखो ताकि वह दिन आए जो हमेशा के वादे का दिन है। मैं ख़ुदा की तरफ़ से एक जलाल बनकर प्रकट हुआ हूँ और मैं उसकी कुदरतों में से एक मुजस्सम (साकार) क़ुदरत हूँ, लेकिन मेरे बाद दूसरे लोग होंगे जो उसकी दूसरी क़ुदरत के जलाल के वाहक होंगे।”

हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी (अ.), संस्थापक अहमदिया मुस्लिम जमाअत

अंततः इस्लाम के पुनरुत्थान का प्रतिश्रुत समय आया। हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (अ.) ने ज़माने के इमाम, प्रतिश्रुत महदी और मसीह मौऊद होने का दावा किया—जो ईश्वर के नबी थे, परंतु पवित्र पैग़ंबर (स.) की पूर्ण अधीनता व उम्मती के रूप में। आपने 1889 में अहमदिया मुस्लिम जमाअत की नींव रखी।

1908 में आपके देहांत के बाद अल्लाह ने अपने वादे को पूरा किया और एक बार फिर नुबुव्वत की पद्धति पर ख़िलाफ़त की स्थापना की। एक शताब्दी से अधिक समय से अहमदिया मुस्लिम जमाअत इस ईश्वरीय संस्था के मार्गदर्शन में प्रगति कर रही है और विश्व के समक्ष इस्लाम की सच्ची शिक्षाएँ प्रस्तुत कर रही है।

Hazrat Hakeem Nooruddin(ra)

हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) का जन्म 1841 में पंजाब के भेरा गाँव में हुआ था। वे भेरा के हाफ़िज़ ग़ुलाम रसूल के सबसे छोटे पुत्र थे। उनका वंश-वृक्ष इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि.) से मिलता है। वे एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे—प्रतिभाशाली लेखक, प्रख्यात विद्वान और उच्च कोटि के धर्मशास्त्री। चिकित्सा विज्ञान (तिब्ब) में अत्यंत कुशल होने के कारण वे कई वर्षों तक जम्मू-कश्मीर के महाराजा के शाही चिकित्सक रहे। वे सत्य ज्ञान के खोजी थे और इसी खोज में उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ कीं तथा मक्का व मदीना के पवित्र शहरों में चार वर्ष रहने का सौभाग्य प्राप्त किया।

ईश्वरीय निर्देश के तहत जब मसीह मौऊद (अ.) ने 23 मार्च 1889 को बैअत का सिलसिला शुरू किया, तो मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आपके हाथ पर निष्ठा की शपथ ली। मसीह मौऊद (अ.) के प्रति उनका समर्पण और निष्ठा परिपूर्ण थी।

मसीह मौऊद (अ.) के देहांत के बाद 27 मई 1908 को हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) को सर्वसम्मति से पहला ख़लीफ़ा चुना गया। उन्होंने शुक्रवार 13 मार्च 1914 को अपने निधन तक इस दायित्व का निर्वहन करते हुए जमाअत का मार्गदर्शन किया।

Hazrat Mirza Bashiruddin Mahmud Ahmad(ra)

पवित्र पैग़ंबर (स.) की एक हदीस में वर्णित है कि प्रतिश्रुत मसीह विवाह करेंगे और उनकी संतान होगी। यह इस बात का संकेत था कि यह विवाह विशेष स्वरूप का होगा और इसके माध्यम से अल्लाह उन्हें ऐसी संतान प्रदान करेगा जो उनके मिशन को आगे बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होगी।

मसीह मौऊद (अ.) को स्वयं ऐसे ईश्वरीय इल्हाम प्राप्त हुए जिनमें एक प्रतापी पुत्र के जन्म की भविष्यवाणी थी जो ‘मुस्लेह मौऊद’ (प्रतिश्रुत सुधारक) होगा। इस भविष्यवाणी के पूरा होने के रूप में 12 जनवरी 1889 को क़ादियान में हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का जन्म हुआ।

आपको न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त था, बल्कि बुनियादी तत्वज्ञान पर आपकी दृष्टि इतनी व्यापक और गहरी थी कि दुनियावी ज्ञान से लैस होकर इस्लाम पर प्रहार करने वाला बड़े से बड़ा विद्वान भी आपके समक्ष एक नौसिखिया प्रतीत होता था। अल्लाह ने आपको पवित्र क़ुरआन का अगाध ज्ञान प्रदान किया था, जिससे यह भविष्यवाणी पूरी हुई कि आपके माध्यम से इस्लाम का गौरव और क़ुरआन की गरिमा अकाट्य रूप से स्थापित होगी। अपने जीवनकाल में आपने पवित्र क़ुरआन की दस खंडों पर आधारित एक विस्तृत व्याख्या ‘तफ़्सीरे-कबीर’ लिखी, जो क़ुरआनी तत्वज्ञान का एक अद्भुत स्रोत है।

मसीह मौऊद (अ.) के देहांत के समय केवल 19 वर्ष की आयु में इस प्रतिश्रुत पुत्र ने अपने पिता की शय्या के पास खड़े होकर यह प्रतिज्ञा की थी:

“यदि सब लोग भी आपका साथ छोड़ दें और मैं अकेला रह जाऊँ, तब भी मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा और आपके मिशन के ख़िलाफ़ होने वाले हर विरोध और हमले का मुक़ाबला करूँगा।”

उन्होंने आजीवन इस अहद को निभाया और कभी किसी के विरोध की परवाह किए बिना निरंतर इस्लाम और अहमदियत की प्रगति के लिए सक्रिय रहे।

प्रथम ख़लीफ़ा हज़रत हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) के निधन के बाद 14 मार्च 1914 को आपको मसीह मौऊद (अ.) का दूसरा ख़लीफ़ा चुना गया।

अपनी ख़िलाफ़त के 52 वर्षों के लंबे कालखंड में, जहाँ जमाअत ने आपके नेतृत्व में अभूतपूर्व प्रगति की, वहीं आपने नाज़ुक मोड़ों पर पूरे देश और क़ौम का भी मार्गदर्शन किया। साइमन कमीशन और गोलमेज़ सम्मेलनों के दौरान आपने अपने बहुमूल्य लेखों और भाषणों से मार्गदर्शन दिया।

इसके अतिरिक्त, विभिन्न समुदायों के बीच शांति, सौहार्द और सद्भावना स्थापित करने के लिए आपने ‘संस्थापक-ए-मज़ाहिब दिवस’ (Founders of Religions Day) के सम्मेलनों की नींव रखी, जिसमें एक ही मंच से विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने धर्म और संस्थापकों की शिक्षाओं पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता था।

एक अविस्मरणीय विरासत छोड़कर 8 नवंबर 1965 को हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का निधन हुआ।

Hazrat Mirza Nasir Ahmad(rh)

तालमूद में एक ऐसा उल्लेख मिलता है जो संकेत करता है कि मसीह के निधन के बाद उसका आध्यात्मिक राज्य उसके पुत्र और पौत्र (पोते) को प्राप्त होगा। अपनी पुस्तक ‘हक़ीक़तुल वह्यी’ में मसीह मौऊद (अ.) ने चार पुत्रों और भविष्य में एक पोते के जन्म की ईश्वरीय सूचना पर अल्लाह का आभार व्यक्त किया था। यह बहुप्रतीक्षित भविष्यवाणी तब पूरी हुई जब 16 नवंबर 1909 को हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम मिर्ज़ा नासिर अहमद रखा गया।

हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) 1965 में मसीह मौऊद (अ.) के तीसरे ख़लीफ़ा बने। इसके बाद उन्होंने जमाअत की प्रचार गतिविधियों का अत्यधिक विस्तार किया।

1970 के दशक में जब पाकिस्तान ने अहमदिया मुस्लिम जमाअत को ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक घोषित किया, तब हज़रत मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) के मार्गदर्शन ने ही जमाअत को इन कठिन परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करने का संबल दिया। उनका यह ऐतिहासिक ख़ुतबा भी अत्यंत उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि हम सच्चे मुसलमान हैं। आपने फ़रमाया:

“हम अत्यंत पीड़ादायक दौर से गुज़रे हैं और अब हमें ऐसी सूचनाएँ मिल रही हैं कि जहाँ भी अहमदिया सदस्यों की संख्या कम और वे कमज़ोर हैं, वहाँ उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। उन्हें अन्न-जल तक नहीं मिलने दिया जा रहा। दुकानदारों से कहा जा रहा है कि वे उन्हें जीवन-यापन की अनिवार्य वस्तुएँ भी न बेचें, और पानी पहुँचाने वालों को पानी देने से रोका जा रहा है। हमें भूख की इस तकलीफ़ की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि पवित्र क़ुरआन में हमें पहले ही सावधान किया गया है:

‘और हम ज़रूर तुम्हें कुछ भय और भूख और मालों और जानों और फलों के नुक़सान से आज़माएँगे।’ (2:156)

“जो रिपोर्टें आ रही हैं वे बताती हैं कि इस समय अहमदियों को दाना-पानी से वंचित करने पर ज़ोर है। ऐसी रिपोर्टें मिलने पर मैं याद करता हूँ और अपने साथियों को भी याद दिलाता हूँ कि हमारे प्यारे आक़ा, खातम-उन-नबिय्यीन मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) को मक्का के दौर में सभी मुसलमानों के साथ ‘शेबे-अबी तालिब’ की तंग घाटी में ढाई से तीन साल तक घेराबंदी में रखा गया था। उन सभी की कड़ी परीक्षा ली गई थी और जीवन की बुनियादी ज़रूरतों से वंचित किया गया था। लेकिन अल्लाह ने ऐसा प्रबंध किया कि उन्हें कठिनाई से ही सही, जीवित रहने भर का सहारा मिलता रहा।”

ख़िलाफ़त के सोलह से अधिक वर्षों में इस्लाम की निरंतर विजय के मील के पत्थर स्थापित करने के पश्चात 9 जून 1982 को हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) का निधन हुआ।

Hazrat Mirza Tahir Ahmad(rh)

हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का निकाह 7 फ़रवरी 1924 को हज़रत सैयदा मरयम बेगम साहिबा से हुआ। निकाह के ख़ुतबे में मसीह मौऊद (अ.) के एक बुज़ुर्ग साथी सैयद सरवर शाह साहिब (रज़ि.) ने कहा था:

“मेरी आयु अब अधिक हो चुकी है और मैं शीघ्र ही इस संसार से विदा हो जाऊँगा, परंतु जो जीवित रहेंगे वे इस सैयदा के साथ हुए निकाह से धर्म के ऐसे सेवकों का जन्म देखेंगे जैसा कि पहले हुआ था। यह मेरा दृढ़ विश्वास है।”

धर्म के इसी महान सेवक हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) का जन्म 18 दिसंबर 1928 को क़ादियान में हुआ। अपने प्रतापी पिता और धर्मपरायण माता के संरक्षण तथा ईश्वरीय कृपा से आप एक नेक और सदाचारी व्यक्तित्व के रूप में बड़े हुए।

आपकी विद्वता में आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों प्रकार का व्यापक ज्ञान समाहित था। स्नातक के बाद आपने जामिया अहमदिया रब्वा से ‘शाहिद’ की डिग्री प्राप्त की। इसके पश्चात आपने यूरोप में ढाई वर्ष तक उच्च अध्ययन किया।

9 जून 1982 को हज़रत मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) के निधन के उपरांत हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) को मसीह मौऊद (अ.) का चौथा ख़लीफ़ा चुना गया। आपके कुशल नेतृत्व और ईश्वरीय सहायता से अहमदिया मुस्लिम जमाअत ने अभूतपूर्व प्रगति की। भौगोलिक, ऐतिहासिक, नैतिक और आध्यात्मिक हर दृष्टि से यह प्रगति स्पष्ट दिखाई दी।

हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) के दौर में जमाअत का प्रभाव व्यापक हुआ और बड़ी संख्या में लोग, जिनमें कई प्रख्यात हस्तियाँ और क़बीलाई शासक भी शामिल थे, जमाअत में सम्मिलित हुए।

1992 में आपके मार्गदर्शन में लंदन से पहले मुस्लिम टेलीविज़न (MTA) का शुभारंभ हुआ। वर्तमान में एमटीए इंटरनेशनल नेटवर्क 9 चैनलों का संचालन करता है जिसे दुनिया भर में करोड़ों लोग देखते हैं।

1994 में हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) ने एक वैश्विक मानवतावादी संस्था ‘ह्युमैनिटी फर्स्ट’ (Humanity First) की स्थापना की। यह अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी जाति, धर्म या राजनीति से परे ज़रूरतमंदों की सहायता करती है और वर्तमान में भारत सहित 53 देशों में इसके पंजीकृत कार्यालय हैं।

19 अप्रैल 2003 को हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) का निधन हुआ।

Mirza Masroor Ahmad

हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़) का जन्म 15 सितंबर 1950 को रब्वा (पाकिस्तान) में हज़रत मिर्ज़ा मंसूर अहमद और हज़रत नासिरा बेगम अहमद के घर हुआ। 1977 में कृषि विश्वविद्यालय फ़ैसलाबाद (पाकिस्तान) से कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural Economics) में स्नातकोत्तर (Master’s) की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात हुज़ूर-ए-अन्वर ने औपचारिक रूप से अपना जीवन इस्लाम की सेवा के लिए समर्पित (वक़्फ़) कर दिया।

1977 से 1985 तक हुज़ूर-ए-अन्वर ने घाना (पश्चिम अफ़्रीका) में अपनी सेवाएँ दीं, जहाँ आप सामाजिक, शैक्षणिक और कृषि विकास परियोजनाओं में सक्रिय रहे। घाना के इतिहास में पहली बार वहाँ की धरती पर सफलतापूर्वक गेहूँ उगाने का श्रेय हुज़ूर-ए-अन्वर को ही जाता है।

चौथे ख़लीफ़ा के निधन के पश्चात 22 अप्रैल 2003 को हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़) को मसीह मौऊद (अ.) का पाँचवाँ ख़लीफ़ा चुना गया। आप वर्तमान में विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के सर्वोच्च आध्यात्मिक और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मार्गदर्शन कर रहे हैं। हुज़ूर-ए-अन्वर के विषय में और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें।

Hazrat Hakeem Nooruddin(ra)

हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) का जन्म 1841 में पंजाब के भेरा गाँव में हुआ था। वे भेरा के हाफ़िज़ ग़ुलाम रसूल के सबसे छोटे पुत्र थे। उनका वंश-वृक्ष इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि.) से मिलता है। वे एक अद्वितीय व्यक्तित्व थे—प्रतिभाशाली लेखक, प्रख्यात विद्वान और उच्च कोटि के धर्मशास्त्री। चिकित्सा विज्ञान (तिब्ब) में अत्यंत कुशल होने के कारण वे कई वर्षों तक जम्मू-कश्मीर के महाराजा के शाही चिकित्सक रहे। वे सत्य ज्ञान के खोजी थे और इसी खोज में उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ कीं तथा मक्का व मदीना के पवित्र शहरों में चार वर्ष रहने का सौभाग्य प्राप्त किया।

ईश्वरीय निर्देश के तहत जब मसीह मौऊद (अ.) ने 23 मार्च 1889 को बैअत का सिलसिला शुरू किया, तो मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आपके हाथ पर निष्ठा की शपथ ली। मसीह मौऊद (अ.) के प्रति उनका समर्पण और निष्ठा परिपूर्ण थी।

मसीह मौऊद (अ.) के देहांत के बाद 27 मई 1908 को हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) को सर्वसम्मति से पहला ख़लीफ़ा चुना गया। उन्होंने शुक्रवार 13 मार्च 1914 को अपने निधन तक इस दायित्व का निर्वहन करते हुए जमाअत का मार्गदर्शन किया।

Hazrat Mirza Bashiruddin Mahmud Ahmad(ra)

पवित्र पैग़ंबर (स.) की एक हदीस में वर्णित है कि प्रतिश्रुत मसीह विवाह करेंगे और उनकी संतान होगी। यह इस बात का संकेत था कि यह विवाह विशेष स्वरूप का होगा और इसके माध्यम से अल्लाह उन्हें ऐसी संतान प्रदान करेगा जो उनके मिशन को आगे बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होगी।

मसीह मौऊद (अ.) को स्वयं ऐसे ईश्वरीय इल्हाम प्राप्त हुए जिनमें एक प्रतापी पुत्र के जन्म की भविष्यवाणी थी जो ‘मुस्लेह मौऊद’ (प्रतिश्रुत सुधारक) होगा। इस भविष्यवाणी के पूरा होने के रूप में 12 जनवरी 1889 को क़ादियान में हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का जन्म हुआ।

आपको न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त था, बल्कि बुनियादी तत्वज्ञान पर आपकी दृष्टि इतनी व्यापक और गहरी थी कि दुनियावी ज्ञान से लैस होकर इस्लाम पर प्रहार करने वाला बड़े से बड़ा विद्वान भी आपके समक्ष एक नौसिखिया प्रतीत होता था। अल्लाह ने आपको पवित्र क़ुरआन का अगाध ज्ञान प्रदान किया था, जिससे यह भविष्यवाणी पूरी हुई कि आपके माध्यम से इस्लाम का गौरव और क़ुरआन की गरिमा अकाट्य रूप से स्थापित होगी। अपने जीवनकाल में आपने पवित्र क़ुरआन की दस खंडों पर आधारित एक विस्तृत व्याख्या ‘तफ़्सीरे-कबीर’ लिखी, जो क़ुरआनी तत्वज्ञान का एक अद्भुत स्रोत है।

मसीह मौऊद (अ.) के देहांत के समय केवल 19 वर्ष की आयु में इस प्रतिश्रुत पुत्र ने अपने पिता की शय्या के पास खड़े होकर यह प्रतिज्ञा की थी:

“यदि सब लोग भी आपका साथ छोड़ दें और मैं अकेला रह जाऊँ, तब भी मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा और आपके मिशन के ख़िलाफ़ होने वाले हर विरोध और हमले का मुक़ाबला करूँगा।”

उन्होंने आजीवन इस अहद को निभाया और कभी किसी के विरोध की परवाह किए बिना निरंतर इस्लाम और अहमदियत की प्रगति के लिए सक्रिय रहे।

प्रथम ख़लीफ़ा हज़रत हकीम नूरुद्दीन (रज़ि.) के निधन के बाद 14 मार्च 1914 को आपको मसीह मौऊद (अ.) का दूसरा ख़लीफ़ा चुना गया।

अपनी ख़िलाफ़त के 52 वर्षों के लंबे कालखंड में, जहाँ जमाअत ने आपके नेतृत्व में अभूतपूर्व प्रगति की, वहीं आपने नाज़ुक मोड़ों पर पूरे देश और क़ौम का भी मार्गदर्शन किया। साइमन कमीशन और गोलमेज़ सम्मेलनों के दौरान आपने अपने बहुमूल्य लेखों और भाषणों से मार्गदर्शन दिया।

इसके अतिरिक्त, विभिन्न समुदायों के बीच शांति, सौहार्द और सद्भावना स्थापित करने के लिए आपने ‘संस्थापक-ए-मज़ाहिब दिवस’ (Founders of Religions Day) के सम्मेलनों की नींव रखी, जिसमें एक ही मंच से विभिन्न धर्मों के विद्वानों को अपने धर्म और संस्थापकों की शिक्षाओं पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता था।

एक अविस्मरणीय विरासत छोड़कर 8 नवंबर 1965 को हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का निधन हुआ।

Hazrat Mirza Nasir Ahmad(rh)

तालमूद में एक ऐसा उल्लेख मिलता है जो संकेत करता है कि मसीह के निधन के बाद उसका आध्यात्मिक राज्य उसके पुत्र और पौत्र (पोते) को प्राप्त होगा। अपनी पुस्तक ‘हक़ीक़तुल वह्यी’ में मसीह मौऊद (अ.) ने चार पुत्रों और भविष्य में एक पोते के जन्म की ईश्वरीय सूचना पर अल्लाह का आभार व्यक्त किया था। यह बहुप्रतीक्षित भविष्यवाणी तब पूरी हुई जब 16 नवंबर 1909 को हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) के घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम मिर्ज़ा नासिर अहमद रखा गया।

हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) 1965 में मसीह मौऊद (अ.) के तीसरे ख़लीफ़ा बने। इसके बाद उन्होंने जमाअत की प्रचार गतिविधियों का अत्यधिक विस्तार किया।

1970 के दशक में जब पाकिस्तान ने अहमदिया मुस्लिम जमाअत को ग़ैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक घोषित किया, तब हज़रत मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) के मार्गदर्शन ने ही जमाअत को इन कठिन परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करने का संबल दिया। उनका यह ऐतिहासिक ख़ुतबा भी अत्यंत उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि हम सच्चे मुसलमान हैं। आपने फ़रमाया:

“हम अत्यंत पीड़ादायक दौर से गुज़रे हैं और अब हमें ऐसी सूचनाएँ मिल रही हैं कि जहाँ भी अहमदिया सदस्यों की संख्या कम और वे कमज़ोर हैं, वहाँ उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है। उन्हें अन्न-जल तक नहीं मिलने दिया जा रहा। दुकानदारों से कहा जा रहा है कि वे उन्हें जीवन-यापन की अनिवार्य वस्तुएँ भी न बेचें, और पानी पहुँचाने वालों को पानी देने से रोका जा रहा है। हमें भूख की इस तकलीफ़ की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि पवित्र क़ुरआन में हमें पहले ही सावधान किया गया है:

‘और हम ज़रूर तुम्हें कुछ भय और भूख और मालों और जानों और फलों के नुक़सान से आज़माएँगे।’ (2:156)

“जो रिपोर्टें आ रही हैं वे बताती हैं कि इस समय अहमदियों को दाना-पानी से वंचित करने पर ज़ोर है। ऐसी रिपोर्टें मिलने पर मैं याद करता हूँ और अपने साथियों को भी याद दिलाता हूँ कि हमारे प्यारे आक़ा, खातम-उन-नबिय्यीन मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) को मक्का के दौर में सभी मुसलमानों के साथ ‘शेबे-अबी तालिब’ की तंग घाटी में ढाई से तीन साल तक घेराबंदी में रखा गया था। उन सभी की कड़ी परीक्षा ली गई थी और जीवन की बुनियादी ज़रूरतों से वंचित किया गया था। लेकिन अल्लाह ने ऐसा प्रबंध किया कि उन्हें कठिनाई से ही सही, जीवित रहने भर का सहारा मिलता रहा।”

ख़िलाफ़त के सोलह से अधिक वर्षों में इस्लाम की निरंतर विजय के मील के पत्थर स्थापित करने के पश्चात 9 जून 1982 को हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) का निधन हुआ।

Hazrat Mirza Tahir Ahmad(rh)

हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (रज़ि.) का निकाह 7 फ़रवरी 1924 को हज़रत सैयदा मरयम बेगम साहिबा से हुआ। निकाह के ख़ुतबे में मसीह मौऊद (अ.) के एक बुज़ुर्ग साथी सैयद सरवर शाह साहिब (रज़ि.) ने कहा था:

“मेरी आयु अब अधिक हो चुकी है और मैं शीघ्र ही इस संसार से विदा हो जाऊँगा, परंतु जो जीवित रहेंगे वे इस सैयदा के साथ हुए निकाह से धर्म के ऐसे सेवकों का जन्म देखेंगे जैसा कि पहले हुआ था। यह मेरा दृढ़ विश्वास है।”

धर्म के इसी महान सेवक हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) का जन्म 18 दिसंबर 1928 को क़ादियान में हुआ। अपने प्रतापी पिता और धर्मपरायण माता के संरक्षण तथा ईश्वरीय कृपा से आप एक नेक और सदाचारी व्यक्तित्व के रूप में बड़े हुए।

आपकी विद्वता में आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों प्रकार का व्यापक ज्ञान समाहित था। स्नातक के बाद आपने जामिया अहमदिया रब्वा से ‘शाहिद’ की डिग्री प्राप्त की। इसके पश्चात आपने यूरोप में ढाई वर्ष तक उच्च अध्ययन किया।

9 जून 1982 को हज़रत मिर्ज़ा नासिर अहमद (रह.) के निधन के उपरांत हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) को मसीह मौऊद (अ.) का चौथा ख़लीफ़ा चुना गया। आपके कुशल नेतृत्व और ईश्वरीय सहायता से अहमदिया मुस्लिम जमाअत ने अभूतपूर्व प्रगति की। भौगोलिक, ऐतिहासिक, नैतिक और आध्यात्मिक हर दृष्टि से यह प्रगति स्पष्ट दिखाई दी।

हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) के दौर में जमाअत का प्रभाव व्यापक हुआ और बड़ी संख्या में लोग, जिनमें कई प्रख्यात हस्तियाँ और क़बीलाई शासक भी शामिल थे, जमाअत में सम्मिलित हुए।

1992 में आपके मार्गदर्शन में लंदन से पहले मुस्लिम टेलीविज़न (MTA) का शुभारंभ हुआ। वर्तमान में एमटीए इंटरनेशनल नेटवर्क 9 चैनलों का संचालन करता है जिसे दुनिया भर में करोड़ों लोग देखते हैं।

1994 में हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) ने एक वैश्विक मानवतावादी संस्था ‘ह्युमैनिटी फर्स्ट’ (Humanity First) की स्थापना की। यह अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी जाति, धर्म या राजनीति से परे ज़रूरतमंदों की सहायता करती है और वर्तमान में भारत सहित 53 देशों में इसके पंजीकृत कार्यालय हैं।

19 अप्रैल 2003 को हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद (रह.) का निधन हुआ।

Mirza Masroor Ahmad

हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़) का जन्म 15 सितंबर 1950 को रब्वा (पाकिस्तान) में हज़रत मिर्ज़ा मंसूर अहमद और हज़रत नासिरा बेगम अहमद के घर हुआ। 1977 में कृषि विश्वविद्यालय फ़ैसलाबाद (पाकिस्तान) से कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural Economics) में स्नातकोत्तर (Master’s) की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात हुज़ूर-ए-अन्वर ने औपचारिक रूप से अपना जीवन इस्लाम की सेवा के लिए समर्पित (वक़्फ़) कर दिया।

1977 से 1985 तक हुज़ूर-ए-अन्वर ने घाना (पश्चिम अफ़्रीका) में अपनी सेवाएँ दीं, जहाँ आप सामाजिक, शैक्षणिक और कृषि विकास परियोजनाओं में सक्रिय रहे। घाना के इतिहास में पहली बार वहाँ की धरती पर सफलतापूर्वक गेहूँ उगाने का श्रेय हुज़ूर-ए-अन्वर को ही जाता है।

चौथे ख़लीफ़ा के निधन के पश्चात 22 अप्रैल 2003 को हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़) को मसीह मौऊद (अ.) का पाँचवाँ ख़लीफ़ा चुना गया। आप वर्तमान में विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के सर्वोच्च आध्यात्मिक और प्रशासनिक प्रमुख के रूप में मार्गदर्शन कर रहे हैं। हुज़ूर-ए-अन्वर के विषय में और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें।