पवित्र क़ुरआन

इस्लाम का पवित्र धर्मग्रंथ

पवित्र क़ुरआन उन ईश्वरीय संदेशों (वह्यी) का संकलन है जो तेईस वर्षों की अवधि में पवित्र पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद (स.) पर अवतरित हुए। पवित्र क़ुरआन मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ है। यह अंतिम ईश्वरीय विधान (शरीयत) है जो मनुष्य के सामाजिक और नैतिक आचरण के लिए नियम व आदेश निर्धारित करता है, तथा इसमें एक व्यापक धार्मिक दर्शन समाहित है। क़ुरआन की भाषा अरबी है।

अपने मूल नाम के अतिरिक्त, पवित्र क़ुरआन को निम्नलिखित नामों से भी जाना जाता है: अल-किताब (वह पुस्तक), अल-फ़ुरक़ान (सत्य और असत्य में भेद करने वाली), अल-ज़िक्र (स्मरण या उपदेश), अल-बयान (स्पष्ट व्याख्या), अल-बुरहान (प्रमाण या तर्क), अल-हक़ (परम सत्य), अत-तंज़ील (अवतरित कलाम), अल-हिकमत (तत्वदर्शिता या बुद्धिमत्ता), अल-हुदा (मार्गदर्शक), अल-हुक्म (निर्णय), अल-मौइज़ाह (सद्उपदेश), अर-रहमत (दया या कृपा), अन-नूर (प्रकाश), अर-रूह (आत्मा या कलाम)।

पवित्र क़ुरआन की विषय-वस्तु

मुसलमानों के लिए पवित्र क़ुरआन अल्लाह का कलाम (ईश्वर की वाणी) है और इसमें संपूर्ण मानव जाति के लिए पूर्ण मार्गदर्शन निहित है। क़ुरआन ईश्वर का परिपूर्ण स्वरूप, उसके गुण और उसके साथ मनुष्य के संबंध की व्याख्या करता है। इसमें मनुष्य के लिए निर्देश, अपने साथी प्राणियों के साथ उसके पारस्परिक व्यवहार के नियम, कतिपय नबियों और जातियों के ऐतिहासिक वृत्तांत, परलोक (आख़िरत) के विषय में जानकारी आदि शामिल हैं। व्यापक रूप से देखा जाए तो पवित्र क़ुरआन की विषय-वस्तु पाँच मुख्य श्रेणियों में आती है: आध्यात्मिक जगत का स्वरूप, विधान और आदेश, ऐतिहासिक वृत्तांत, तत्वज्ञान (हिकमत), और भविष्यवाणियाँ।

पवित्र क़ुरआन 114 अध्यायों में विभाजित है जिन्हें ‘सूरह’ कहा जाता है, और प्रत्येक अध्याय अलग-अलग श्लोकों से मिलकर बना है जिन्हें ‘आयात’ कहा जाता है। पवित्र क़ुरआन में कुल 6,348 आयतें हैं। इन अध्यायों की लंबाई भिन्न-भिन्न है—कुछ केवल कुछ पंक्तियों के हैं जबकि अन्य कई पृष्ठों तक विस्तृत हैं। सूरह अल-बक़रह सबसे लंबा अध्याय है जिसमें 287 आयतें हैं, जबकि सूरह अल-कौसर केवल चार आयतों के साथ सबसे छोटा अध्याय है।

एक सार्वभौमिक संदेश

अनादि काल से यह ईश्वरीय नियम रहा है कि जब भी मनुष्य ने धार्मिकता का मार्ग छोड़ा और बुराइयों में आगे बढ़ा, ईश्वर द्वारा उसके सुधार के लिए एक ईश्वरीय रसूल भेजा गया, जो उसे नैतिक अंधकार के गर्त से निकालकर आध्यात्मिक प्रकाश की ओर ले जाए। इसीलिए, उसने सभी जातियों में अपने चुने हुए पैग़ंबर भेजे जो अपने-अपने लोगों तक ईश्वरीय संदेश पहुँचाते रहे।

हालाँकि, वे पैग़ंबर और उनके द्वारा लाए गए विधान किसी विशेष जाति या समुदाय के लिए और एक निश्चित समय तक ही सीमित थे। परंतु, जब मानवीय अनुभव का विस्तार हुआ और मनुष्य में सार्वभौमिकता की चेतना विकसित हुई, तब एक परिपूर्ण और शाश्वत विधान की आवश्यकता हुई, जो समय या स्थान के संदर्भ में मानव जाति के किसी एक हिस्से तक सीमित न हो। पवित्र क़ुरआन का संदेश ऐसा ही है, जिसमें पूर्ववर्ती धर्मों की सभी आवश्यक शिक्षाओं को समाहित किया गया—मानव प्रगति की गति के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए नए आदेश जोड़े गए, उन सिद्धांतों को हटा दिया गया जो विशुद्ध रूप से स्थानीय या अस्थायी स्वरूप के थे, और उन आदेशों को बनाए रखा गया जो सार्वभौमिक प्रकृति के थे और जिनकी मनुष्य को निरंतर आवश्यकता थी।

पवित्र क़ुरआन का संरक्षण

पवित्र क़ुरआन का मूल पाठ (टेक्स्ट) पिछले 1400 वर्षों से पूरी तरह अपरिवर्तित रहा है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि ईश्वर स्वयं पवित्र क़ुरआन में फ़रमाता है कि वह स्वयं इस पुस्तक की रक्षा करेगा:

“निश्चय ही हमने ही इस उपदेश (क़ुरआन) को उतारा है, और निश्चय ही हम ही इसके रक्षक हैं।”

पवित्र क़ुरआन (15:10)

प्रारंभ से ही पवित्र पैग़ंबर (स.) ने क़ुरआनी वह्यी के संरक्षण के लिए दो स्वतंत्र किंतु परस्पर पूरक विधियों का उपयोग किया। इस उद्देश्य के लिए अपनाई गई दो विधियाँ कंठस्थीकरण (हिफ़्ज़/याद करना) और लिपिबद्ध करना (लिखना) थीं। संदेश के प्रसार को स्वतंत्र रूप से सुनिश्चित करने के अलावा, इन दोनों विधियों ने आंतरिक सत्यापन का भी कार्य किया, जिससे इसका सटीक संरक्षण सुनिश्चित हुआ।

यह तथ्य कि पवित्र क़ुरआन आज भी वही अपरिवर्तित और सुरक्षित पुस्तक है जो पवित्र पैग़ंबर (स.) पर अवतरित हुई थी, इस्लाम के कई कट्टर विरोधियों द्वारा भी स्वीकार किया गया है:

“आंतरिक और बाह्य रूप से इस बात की पूरी सुरक्षा और प्रमाण है कि हमारे पास वही मूल पाठ मौजूद है जो स्वयं मुहम्मद ने प्रस्तुत किया और उपयोग में लाया था।”

सर विलियम म्योर, ‘द लाइफ़ ऑफ़ महोमेट‘, पृ. 561

“क़ुरआन में बाद के प्रक्षेपों (फेरबदल) के अस्तित्व को सिद्ध करने के यूरोपीय विद्वानों के प्रयास पूरी तरह विफल रहे हैं।”

प्रोफ़ेसर नोल्डेके, इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका; 9वाँ संस्करण, ‘क़ुरआन‘ शीर्षक के अंतर्गत

इस तथ्य की पुष्टि अन्य स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा भी की गई है और आज पवित्र क़ुरआन की कई प्राचीन पांडुलिपियों—जैसे बर्मिंघम पांडुलिपि, ट्यूबिंगन पांडुलिपि आदि—के साथ तुलना करके इसे प्रमाणित किया जा सकता है।

प्रतिश्रुत मसीह (हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अ.) एवं संस्थापक अहमदिया मुस्लिम जमाअत फ़रमाते हैं:

“क़ुरआन शरीफ़ एक यकता गौहर है। इसका ज़ाहिर नूर है और इसका बातिन नूर है और इसका ऊपर नूर है और इसका नीचे नूर है और इसके हर एक लफ़्ज़ में नूर है। वह एक रूहानी बाग़ है जिसके गुच्छेदार फल निकट हैं और उसमें नहरें जारी हैं। हर एक सआदत का फल इसमें मिलता है और हर एक चिराग़ इसी से रौशन होता है। इसका नूर मेरे दिल में पहुँच गया है और किसी दूसरे ज़रीए से मुझे यह प्राप्त नहीं हो सकता था। और अल्लाह गवाह है कि अगर क़ुरआन न होता तो मुझे ज़िंदगी में कोई लुत्फ़ न आता।”

‘आईना-ए-कमाले-इस्लाम ‘, रूहानी ख़ज़ाइन, खंड 5, पृष्ठ 545-546

अतः पवित्र क़ुरआन अपने सच्चे अनुयायी को अपने आध्यात्मिक प्रभाव और अपने स्वाभाविक नूर के माध्यम से अपनी ओर खींचता है और उसके हृदय को प्रकाशित करता है, और फिर बड़े-बड़े निशान दिखाकर ईश्वर के साथ ऐसा सुदृढ़ संबंध स्थापित कर देता है जिसे कोई तेज़ तलवार भी नहीं काट सकती।