कोई व्यक्ति यदि एक कण का हज़ारवां भाग क़ुरआन करीम में से कुछ दोष निकाल सके या इसके मुक़ाबले में अपनी किसी पुस्तक की एक कणभर कोई ऐसी विशेषता सिद्ध कर सके जो क़ुरआनी शिक्षा के विपरीत हो और इससे उत्तम हो तो हम प्राण-दंड भी स्वीकार करने को तैयार हैं।

(कथन हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी मसीह मौऊद और महदी माहूद अलैहिस्सलाम)


MARCH 22, 2021

समस्त क़ाफिर क़ुरआन करीम के मुक़ाबले पर सरस और सुबोध शैली के दावे तथा कवियों के बादशाह कहलाने के बावजूद मुख बंद किए बैठे रहे, तथा अब भी खामोश और निरुतर बैठे हुए हैं उनकी यही ख़ामोशी उनकी असमर्थता पर साक्ष्य प्रस्तुत कर रही है क्योंकि असमर्थता और क्या होती है यही तो है कि प्रतिद्वन्दी के तर्क को सुनकर और समझ कर खण्डन करके न दिखा सकें।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 152 हाशिया नंबर 11)[1]

क़ुरआन की तीन विशेषताएं

क़ुरआन में तीन विशेषताएं हैं। प्रथम यह कि जो धार्मिक ज्ञान लोगों को ज्ञात नहीं रहे थे उनकी ओर मार्गदर्शन करता है। द्वितीय जिन ज्ञानों में पहले कुछ संक्षेप चल रहा था उनकी व्याख्या करता है। तृतीय जिन बातों में मतभेद, विवाद, उत्पन्न हो गया था उन में न्याय-संगत बात वर्णन करके सत्य और असत्य में अंतर प्रकट करता है।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 225 हाशिया नंबर 11)

ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत करो जो क़ुरआन में न हो

 

हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी मसीह मौऊद और महदी माहूद अलैहिस्सलाम क़ुरआन पर आरोप लगाने वालों और उसके विरोधियों को संबोधित करके फ़रमाते हैं।

यदि आप लोग कोई ठोस सच्चाई लिए बैठे हैं जिसके सम्बन्ध में तुम्हारा यह विचार है कि हम ने घोर परिश्रम, मेहनत और बड़बोलेपन से उसे उत्पन्न किया है और जो तुम्हारे मिथ्या विचार में क़ुरआन करीम इस सच्चाई के वर्णन करने में असमर्थ है तो तुम्हे सौगन्ध है कि सब कारोबार छोड़ कर वह सच्चाई हमारे सामने प्रस्तुत करो ताकि हम तुम्हे क़ुरआन करीम में से निकाल कर दिखा दें, परन्तु फिर मुसलमान होने के लिए तैयार रहो। यदि अब भी आप लोग दुर्भावना और बक बक करना न छोड़ें तथा शास्त्रार्थ का सीधा मार्ग न अपनाएं तो इसके अतिरिक्त और क्या कहें कि झूठों पर ख़ुदा की फटकार हो।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 227 हाशिया नंबर 11)

क़ुरआन करीम की सच्चाई प्रमाणित करना हमारे ज़िम्मे है

यदि इस बात में संदेह हो कि क़ुरआन करीम क्योंकर अध्यात्म ज्ञान की समस्त सच्चायों पर व्याप्त है तो इस बात का हम ही दायित्व लेते हैं कि यदि कोई सज्जन सत्य अभिलाषी बनकर अर्थात् इस्लाम स्वीकार करने का लिखित आश्वासन देकर किसी इबरानी, यूनानी, लातीनी, अंग्रेज़ी, संस्कृत इत्यादि की किताब से कुछ धार्मिक सच्चाइयां निकाल कर प्रस्तुत करें या अपनी ही बुद्धि के बल पर अध्यात्म ज्ञान का कोई अत्यंत बारीक़ रहस्य पैदा करके दिखलाएं तो हम उसे क़ुरआन करीम में से निकाल देंगे।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ  272)

पवित्र कुरआन ने अपनी रौशनी प्रत्येक युग में स्वयं दिखाई

यदि आँहज़रत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम न आए होते और क़ुरआन करीम जिसके प्रभाव हमारे इमाम और बुज़ुर्ग हमेशा से देखते आए और आज हम देख रहे हैं न उतरा होता तो हमारे लिए यह बात अत्यंत कठिन होती कि हम जो केवल बाइबल के देखने से निश्चित तौर पर पहचान कर सकते की हज़रत मूसा और हज़रत मसीह और अन्य पूर्वकालीन नबी वास्तव में उसी पवित्र और पुनीत जमाअत में से हैं जिन्हें ख़ुदा ने अपनी विशेष कृपा से अपनी रिसालत के लिए चुन लिया है यह हमें क़ुरआन करीम का उपकार मानना चाहिए जिसने अपना प्रकाश प्रत्येक युग में स्वयं दिखाया और फिर उस पूर्ण प्रकाश से पूर्वकालीन नबियों की सच्चाई भी हम पर प्रकट कर दी और यह उपकार न केवल हम पर अपितु आदम से लेकर मसीह तक उन समस्त नबियों पर है जो क़ुरआन करीम से पूर्व गुज़र चुके तथा प्रत्येक रसूल उस सर्वश्रेष्ठ के उपकार का आभारी है जिसे ख़ुदा ने वह पूर्ण और पुनीत किताब प्रदान की जिसके पूर्ण प्रभावों की बरकत से समस्त सच्चाइयां हमेशा के लिए जीवित हैं, जिसने और नबियों की नुबुव्वत पर विश्वास करने के लिए एक ओर मार्ग खुलता है और उनकी नुबुव्वत संदेह और आशंकाओं से सुरक्षित रहती है।

पवित्र क़ुरआन के दो प्रकार के चमत्कार

स्पष्ट हो कि क़ुरआन करीम में हमेशा के लिए दो प्रकार के चमत्कार रखे गए हैं। एक क़ुरआन करीम के कलाम का चमत्कार दूसरा क़ुरआन करीम के कलाम के प्रभाव का चमत्कार। यह दोनों चमत्कार ऐसे असंदिग्ध हैं कि यदि किसी का हृदय बाह्य या आंतरिक विमुखता से संकीर्ण न हो तो वह तुरंत उस सच्चाई के प्रकाश को स्वयं अपनी आंखों से देख लेगा………क़ुरआन करीम के कलाम के प्रभाव के संदर्भ में हम यह सबूत रखते हैं कि आज तक कोई ऐसी शताब्दी नहीं गुज़री जिसमें ख़ुदा तआला ने तत्पर और सत्याभिलाषी लोगों को क़ुरआन करीम का पूर्ण अनुसरण करने से पूर्ण प्रकाश तक नहीं पहुंचाया और अब भी अभिलाषी के लिए इस प्रकाश का अत्यंत विशाल द्वार खुला है यह नहीं कि केवल किसी पूर्व शताब्दी का उदाहरण दिया जाए जिस प्रकार सच्चे धर्म और ख़ुदाई किताब के वास्तविक अनुयायियों में अध्यात्मिक बरकते होनी चाहिए और ख़ुदा के विशिष्ट रहस्यों से इल्हाम वाला होना चाहिए वही बरकते अभिलाषी के लिए प्रकट हो सकती हैं जिसकी इच्छा हो निष्ठा के साथ ध्यान दें और देखें तथा अपने अंत को सुधार ले।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 290 हाशिया नंबर 1)

क़ुरआन में कुछ दोष निकाल कर दिखाओं

यदि कोई व्यक्ति एक कण का हज़रवा भाग क़ुरआन करीम में कुछ दोष निकाल सके या उसके मुक़ाबले में अपनी किसी पुस्तक की एक कणभर कोई ऐसी विशेषता सिद्ध कर सके जो क़ुरआनी शिक्षा के विपरीत हो और उससे उत्तम हो तो हम प्राण-दंड भी स्वीकार करने को तैयार हैं। अतः निर्णय और न्याय करने वालों !!  विचार करो और ख़ुदा के लिए थोड़ा ह्रदय को स्वच्छ करके सोचो कि हमारे विरोधियों की इमानदारी और ख़ुदा का भय किस प्रकार का है कि निरुत्तर रहने के बावजूद फिर भी व्यर्थ बकने से नहीं रुकते।

समस्त सच्चाईयाँ इंजील में नहीं

ज्ञात होना चाहिए कि इंजील कि शिक्षा को पूर्ण विचार करना सरासर बुद्धि की कमी और नादानी है स्वयं हज़रत मसीह ने इंजील की शिक्षा को अपूर्णता से पवित्र नहीं समझा जैसा कि उन्होंने स्वयं फ़रमाया है कि मेरी और बहुत सी बातें हैं कि मैं तुम्हें कहूं परंतु तुम उनको सहन नहीं कर सकते परंतु जब वह अर्थात् “रुहुलहक़” आएगा तो वह तुम्हें समस्त सच्चाई का मार्ग दिखाएगा। इंजील युहन्ना बाब : 16 आयत 12, 13, 14 । अब कहिए क्या यही इंजील है जो समस्त धार्मिक सच्चाइयों पर व्याप्त है जिसके होते हुए क़ुरआन करीम की आवश्यकता नहीं।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 300 हाशिया नंबर 2)

ख़ुदा को पहचानने का सामान क़ुरआन करीम में है इंजील में नहीं

यह तो शोभनीय नहीं कि आप लोग मसीह के अनुयायी कहला कर फिर इस वस्तु को पूर्ण कहें जिसे आप से अठारह सौ ब्यासी वर्ष पूर्व मसीह अपूर्ण ठहरा चुका है और यदि आपका मसीह के कथन पर ईमान ही नहीं तथा स्वयं चाहते हैं कि इंजील का क़ुरआन करीम से मुकाबला करें तो बिस्मिल्लाह आइए और इंजील में से वे विशेषताएं निकाल कर दिखाए कि जो हमने इसी पुस्तक में क़ुरआन करीम के संदर्भ में सिद्ध की हैं ताकि न्याय-प्रिय लोग स्वयं ही देख लें कि ख़ुदा को पहचानने के साधन क़ुरआन करीम में उपलब्ध हैं या इंजील में।

(बराहीन अहमदिया रूहानी ख़ाज़ायन भाग 1 पृष्ठ 301 हाशिया नंबर 2)

References

[1] Barahin-e-Ahmadiyya Parts I & II


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