अनसार अली ख़ान

MARCH 21, 2021

बताऊँ तुम्हें क्या कि क्या चाहता हूँ,
हूँ बन्दा मगर मैं ख़ुदा चाहता हूँ ,
जो फ़िर से हरा करदे हर ख़ुश्क पौधा,
चमन के लिए वो सबा चाहता हूँ ।

प्रिय पाठको ! हमारा प्यारा भारत वर्ष एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है , ऋषि-मुनि तथा अवतारों ने सदा ही इसे अपने ख़ून से सींचा है , इस संसार में जितने धर्म मौजूद हैं तक़रीबन हर धर्म के धर्माबुलम्बी हमारे देश में पाए जाते हैं, इसे एक तरह से धर्म का गुलदस्ता कहना ग़लत न होगा ।


प्रिय पाठको ! वास्तव में संसार जिस संकट से गुज़र रही हैं शांति की स्थापना एक कठिन कार्य है,परन्तु असंभव कदापि नहीं है , अगर हम धर्म की असल परिभाषा को याद रखेंगे और उस पर अमल करेंगे तो एक सुन्दर समाज का गठन कर सकते हैं ,उसके लिए हमारे अन्दर सद्भावना की आवस्यकता है। सुन्दर समाज का गठन,राष्ट्रिय एकता व अखंडता तथा धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए समस्त जाति-धर्म के लोगों का एकत्रित होना अत्यावश्यक है, क्योंकि जाति-वर्ण-धर्म अन्ततः हम सब भारतीय हैं ।


धर्म का अध्ययन करने से हमें ज्ञान्त होगा कि शांति की स्थापना के लिए धर्म हमसे क्या चाहता है और हम क्या करते हैं ? धर्म का अध्ययन से हमें यह भी ज्ञान्त होता है कि संसार में जब भी अशांति उत्पन हुई है उसका मूल कारण अन्याय तथा अत्याचार ही है ।


त्रेत्या युग में श्री राम चन्द्र जी महाराज शांति की स्थापना के लिए १४ वर्ष वन में रहना स्वीकार किया तथा रावण व मेघनाद जैसे अन्याई और क्रूर राजाओं के अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध युद्ध तक किया और शांति की स्थापना किये , समाज में ऊँच-नीच का भेद-भाव समाप्त करने के लिए सबरी के झूठे बेर खा कर मानव जाति के लिए प्रलय दिवस पर्यंत एक उदाहरण छोड़ गए ।


द्वापर युग में भी धर्मराज युधिस्ठिर पर बड़ा अन्याय हुआ , उन से छल करके राज-पाट छीन ली गई,उनके माता समेत सब भाइयों को जला कर मार डालने की षड़यंत्र रची गई , उन पर अत्याचार की सीमा पार करते हुए उनकी धर्म पत्नी का वस्त्रहरण किया गया तथा उन्हें १२ वर्ष तक वनवास तथा १ वर्ष अग्यांत्वास की सज़ा दी गई , परन्तु इसके उपरांत भी श्री कृष्ण जी महाराज ने पांडू पुत्रों को शांति के मार्ग को न छोड़ने की शिक्षा दी ।


इस्लाम धर्म भी मानव जाति से प्रेम की शिक्षा देता है, समाज में शांति की स्थापना के लिए बुराई का उत्तर बुराई से न दे कर अच्छाई से देने की शिक्षा देता है ।


इस्लाम के संस्थापक हजरत मुहम्मद (स्व.अ.व.स) ने इस सन्देश को जब जन-जन तक पहुँचाना आरम्भ किया तो पापी तथा खल प्रब्रुती के लोग सबसे पहले आपके शत्रु बन गए , आपको वह कष्ट दिया कि चौदह शाताब्धि के उपरांत भी उन घटनाओं को याद करने पर भय से ह्रदय कांप उठता है । आप के मानने वालों को घरों से निकाला गया,आरियों से चीरा गया,ऊँटनीओं से बाँध कर घसीटा गया और टांगों को रस्सियों से बाँध कर दोनों तरफ से ऊँटनीओं को भगा कर फाड़ दिए गए ,स्वयं आप (स्व.अ.व.स) को वह कष्ट दिए गए कि मानव इतिहास में इसका दृष्टान्त नहीं मिलता । परन्तु जब आपको विजय प्राप्त हुआ तो आप (स्व.अ.व.स) ने सबको क्षमा कर दिया ।


प्रिय पाठको ! शांति एक अमूल्य सम्पदा है जिसे हर क़ीमत पर अपनाना चाहिए, शांतिमय विश्व की बुनियाद डालने के लिए आवश्यक है कि हम उन सभी अवतारों को सम्मान दें जिन्होंने लोगों के मन में धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न की , क्योंकि सभी अवतार अपने–अपने समय में मानवता की स्थापना की उद्देश से ही अवतरित हुए थे। सभी धर्म-ग्रंथों (आकाशीय पुस्तकों) का आदर करना चाहिए क्योंकि यही धर्म-ग्रन्थ प्राचीनकाल से हमारा मार्ग दर्शन करते आऐ हैं ।


पवित्र कुरान के “सुरह नहल” में लिखा है कि “और हमने हर क़ौम में कोई न कोई हादी (सन्मार्ग पर चलाने वाले) भेजा है” इसी तरह लिखा है कि “ तू केवल आगाह करने वाला है हर एक क़ौम के लिए एक राहनुमा भेजा जा चूका है” ।


प्रिय पाठको ! जब हम दूसरों के धार्मिक भावनाओं की क़द्र करेंगे, उनका आदर करेंगे तो आपस की तल्ख़ियाँ दूर होंगी और एक दुसरे का सहायक बनेंगे । कोई सच्चा धर्म घृणा की शिक्षा नहीं देता बल्कि धर्म की वास्तविकता तो यह है कि वोह ख़ुदा के बन्दों के साथ विनम्रता तथा हमदर्दी की शिक्षा दे । पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स्व.अ.व.स) ने कहा था कि “जो स्रष्टा की सृष्टि से प्रेम नहीं करता वोह स्रष्टा से भी प्रेम नहीं करता” ।


प्रिय पाठको ! हजरत मिर्ज़ा गुलाम अहमद साहिब क़ादियानी संस्थापक अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत वर्णन करते हैं कि “ संसार में मेरा कोई शत्रु नहीं है, मैं मानव जाति से ऐसा प्रेम करता हूँ जैसे एक दयालु माता अपनी संतान से अपितु उससे बढ़ कर” ।


मित्रों ! आपको यह जान कर अति प्रसन्नता होगी कि अंतर्राष्ट्रीय अहमदिय्या मुस्लिम जमात संसार के २१३ देशों में इन्ही सामाजिक कार्यों के कारण परिचित तथा प्रशंसित है ।


तो फिर चलिए हम सब मिलकर आपसी मत-भेद और तल्ख़ियों को भुला कर एक सुन्दर समाज के गठन में एक दुसरे का सहायक बनें ।

मजलिस की दिलकशी में सबका मिजाज़ बदले,
इंसानियत की ख़ातिर तल्ख़ी का राज़ बदले,
इस दौर का ज़िक्र क्या है सारा समाज बदले,
कल की किसे ख़बर है ये बज़्म आज बदले ।


लेखक अहमदिया मुस्लिम जमात सोलापुर के मिशनरी हैं |



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