विरोध करने वालों के साथ हज़रत मुहम्मद (स. अ. व.) का सद व्यवहार


अतः जब मक्का वालों के मुख से इस बात की पुष्टि हो गई कि रसूले करीम स.अ.व यूसुफ़ के प्रारूप थे तथा यूसुफ़ के समान अल्लाह तआला ने उन्हें अपने भाइयों पर विजय प्रदान की थी उसके बाद नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो फैसला सुनाया उसका उदाहरण न इतिहास प्रस्तुत कर सकता है न वर्तमान और भविष्य भी ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने में सदैव अस्मर्थ रहेगा।


शाह हारुन सेफी

13 अगस्त 2021

अल्लाह तआला पवित्र क़ुरआन में हज़रत मुहम्मदस.अ.व. के बारे में फ़रमाता है:

لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا

निःसंदेह तुम में से प्रत्येक व्यक्ति जो अल्लाह और परलोक के दिन की आशा रखता है और अल्लाह को बहुत याद करता है, उस के लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है।[1]

आपस.अ.व का जीवन समस्त मानवजाति के लिए मार्गदर्शक है जिसका अनुसरण करके प्रत्येक व्यक्ति उस उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है जिस उद्देश्य के लिए उसे पैदा किया गया है। अतः हज़रत मुहम्मदस.अ.व ने सामाजिक विषयों पर भी हमारा मार्गदर्शन किया है और आर्थिक विषयों पर भी, पारिवारिक विषयों पर भी और राजनितिक विषयों पर भी, भौतिक विषयों पर भी और आध्यात्मिक विषयों पर भी इसी प्रकार आपने हमें बताया कि अपने समाज के प्रति हमारे क्या दायित्व हैं? हमारे परिवार के प्रति हमारे क्या दायित्व हैं? हमारे पड़ोसी के प्रति हमारे क्या दायित्व हैं? हमारे देश के प्रति हमारे क्या दायित्व हैं? हमारी सृष्टि, हमारे पर्यावरण और जीव जन्तुओ के प्रति हमारे क्या दायित्व है? अर्थात जीवन के प्रत्येक विभाग में हज़रत मुहम्मदस.अ.व समस्त मानवजाति के लिए उत्तम आदर्श हैं। इसके अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति की वास्तविक नैतिकता का ज्ञान इस बात से होता है कि वह अपने विरोधियों या शत्रुओं से किस प्रकार का व्यवहार करता है? निःसंदेह इस विभाग में भी हज़रत मुहम्मदस.अ.व समस्त मानवजाति के लिए उत्तम आदर्श हैं और समस्त मानवजाति के लिए मार्गदर्शक हैं। अतः अपने इस निबन्ध में हम हज़रत मुहम्मदस.अ.व का अपने शत्रुओ के प्रति जो दया, सहानुभूति और सहिष्णुता का व्यवहार था उस पर प्रकाश डालेंगे।

प्रिय पाठको ! फतह मक्का का दिन मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपके 10,000 सहाबा ने मक्का में एक विजयी बादशाह की तरह प्रवेश किया। आज वह दिन था जब मक्का के लोगों को उनके एक-एक अत्याचार का जो उन्होंने मुसलमानों पर किए थे उसका हिसाब देना था। मक्का के लोग डर और खौफ से भयभीत अपने एक-एक अत्याचार को याद कर रहे थे जब वे लोग रसूले करीमस.अ.व. को हर प्रकार से कष्ट दिया करते थे। आपके गले में कपड़ा डाल कर ज़ोर से खींचते जिसके कारण आपकी आँखे बाहर निकल आती। जब आप नमाज़ पढ़ रहे होते तो आपकी पीठ पर ऊँट की ओझड़ी रख दी जाती जिसके कारण आप सिर न उठा सकते। आप के घर में आस-पास के घरों से निरन्तर पत्थर फेंके जाते थे। रसोई घर में गन्दी वस्तुएँ फेंकी जाती थीं, जिन में बकरों और ऊँटों की आंतें भी सम्मिलित होती थीं। जब आप नमाज़ पढ़ते तो आप के ऊपर मिट्टी और धूल डाली जाती। एक बार आप बाज़ार से गुज़र रहे थे कि मक्का के आवारा लोगों का एक समूह आप के चारों ओर हो गया और रास्ते भर आपकी गर्दन पर थप्पड़ मारता चला गया कि लोगो! यह वह व्यक्ति है जो कहता है कि मैं नबी हूँ। इसी प्रकार आपके सहाबा पर असहनीय अत्याचार किए जाते थे। बिलालरज़ि॰ को उनका मालिक गर्म और तपती रेत में लिटा कर ऊपर या तो पत्थर रख देता या युवकों को सीने पर कूदने के लिए नियुक्त कर देते। हबशी नस्ल के बिलालरज़ि॰, उमय्या बिन ख़ल्फ़ नामक एक मक्का के रईस के दास थे। उमय्या उन्हें दोपहर के समय ग्रीष्म ऋतु में मक्का से बाहर ले जा कर तपती रेत पर नंगा करके लिटा देता था और बड़े-बड़े गर्म पत्थर उन के सीने पर रख कर कहता की ‘लात’ और ‘उज़्ज़ा ’ का ईश्वरत्व स्वीकार करो और मुहम्मदस.अ.व से अलग हो जाओ। उन दासों में से सुहैबरज़ि॰ एक धनवान व्यक्ति थे। यह व्यापार करते थे तथा मक्का के बड़े लोगों में से समझे जाते थे, परन्तु इसके बावजूद कि वह धनवान भी थे और आज़ाद भी हो चुके थे, क़ुरैश उन्हें मार-मार कर बेहोश कर देते थे। ज़बीरारज़ि॰ भी एक दासी थीं। उन्हें अबू जहल ने इतना मारा कि उनकी आँखें नष्ट हो गईं। अबू फ़कीहरज़ि॰ सफ़्वान बिन उमैया के दास थे उन्हें उनका स्वामी और उसका ख़ानदान तपती हुई गर्म धरती पर लिटा देता था और बड़े-बड़े गर्म पत्थर उनके सीने पर रख देता, यहां तक कि उनकी जीभ बाहर निकल आती। फिर भी नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का वालों के लिए यही दुआ फ़रमाते कि,

हे अल्लाह! मेरी क़ौम को क्षमा कर दे क्योंकि ये लोग मुझे जानते नहीं। [2]

एक दिन मक्का वालों के अत्याचारों से चूर होकर सहाबा आपकी सेवा में उपस्थित हुए और फ़रमाया कि:

हे अल्लाह के रसूल! मुश्रिकीन के विरुद्ध बददुआ करें परन्तु आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिन्हें अल्लाह तआला ने समस्त लोकों के लिए रहमत बना कर भेजा है आपके पवित्र मुख से जिन शब्दों का उच्चारण हुआ वो स्वर्ण से लिखने योग्य हैं अतः आपने फ़रमाया:

मुझे (लोगों के लिए) लानत (धिक्कार) या अज़ाब बना कर नहीं भेजा गया बल्कि रहमत बनाकर भेजा गया है।[3]

परन्तु मक्का वालों के कुकर्मों और अत्याचारों में प्रतिदिन वृद्धि होती रही यहाँ तक कि आपको और आपके सहाबा को अपने प्रिय शहर मक्का को छोड़ कर मदीना की ओर हिजरत (प्रस्थान) करने के लिए विवश होना पड़ा। लेकिन मक्का वालों के ह्रदय पत्थर की भाँति कठोर हो चुके थे और वो इस्लाम और इस्लाम के संस्थापक हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मिटाने का दृढ़ निश्चय कर चुके थे अर्थात मक्का के लोगों ने मदीना में भी मुसलमानों पर निरन्तर हमलों का सिलसिला आरम्भ कर दिया परन्तु अपने इस नीच उद्देश्य में असफ़ल रहे। फ़तह मक्का का दिन इन समस्त अत्याचारों का बदला लेने का दिन था और प्रत्येक अत्याचारी यह समझ चुका था कि उसके अत्याचारों का केवल एक ही परिणाम होगा यानि मृत्युदण्ड।

जिस समय यह सेना अबू सुफ़यान के सामने से गुज़र रही थी, अन्सार के सेनापति सअद बिन उबादारज़ि॰ ने अबू सुफ़यान को देखकर कहा — आज ख़ुदा तआला ने हमारे लिए मक्का में प्रवेश करना तलवार के बल पर वैध कर दिया है। आज क़ुरैश क़ौम अपमानित कर दी जाएगी। जब रसूलुल्लाहस.अ.व अबू सुफ़यान के पास से गुज़रे तो उसने उच्च स्वर में कहा — हे अल्लाह के रसूल! क्या आपस.अ.व ने अपनी क़ौम के वध की आज्ञा दे दी है। अभी-अभी अन्सार के सरदार सअदरज़ि॰ और उनके साथी ऐसा-ऐसा कह रहे थे। उन्होंने ऊँचे स्वर में यह कहा है — आज युद्ध होगा तथा मक्का की पवित्रता आज हमें युद्ध से नहीं रोक सकेगी और क़ुरैश को हम अपमानित करके छोड़ेंगे। हे अल्लाह के रसूल! आप तो संसार में सर्वाधिक सदाचारी, सबसे अधिक दयालु, अपने परिजनों के साथ सब से अधिक सद्व्यवहार करने वाले व्यक्ति हैं। क्या आज अपनी क़ौम के अत्याचारों को भूल न जाएँगे? अबू सुफ़यान की यह शिकायत और याचना सुनकर वे मुहाजिर (प्रवासी) भी जिन्हें मक्का की गलियों में पीटा और मारा जाता था, जिन्हें घरों और जायदादों के अधिकार से पृथक कर दिया जाता था, तड़प गए और उनके हृदयों में भी मक्का के लोगों के लिए दया की भावना पैदा हो गई। उन्होंने कहा — हे अल्लाह के रसूल! अन्सार ने मक्का वालों के जो अत्याचारपूर्ण वृत्तान्त सुने हुए हैं आज उन के कारण हम नहीं जानते कि वे क़ुरैश के साथ क्या व्यवहार करें। आपस.अ.व ने फ़रमाया — अबू सुफ़यान! सअद ने ग़लत कहा है। आज दया करने का दिन है। आज अल्लाह तआला क़ुरैश और काबा को सम्मान प्रदान करने वाला है। फिर आपस.अ.व ने एक व्यक्ति को सअदरज़ि॰ की ओर भिजवाया और फ़रमाया — अपना झण्डा अपने बेटे क़ैस को दे दो कि वह तुम्हारे स्थान पर अन्सार की सेना का सेनापति होगा।[4]

यह वही अबु सुफ़ियान है जिसके नेतृत्व में इस्लाम के विरुद्ध कई जंगे लड़ी गईं। और उन जंगो में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मुबारक दाँत शहीद किए गए। आपके चाचा को शहीद किया गया आपके नाक, आँख, कान, काट कर आपका मुस्ला अर्थात आपकी लाश को क्षत विक्षत किया गया और उसकी पत्नी हिन्दा ने आपके चाचा का कलेजा निकाल कर चबाया। अर्थात अबु सुफियान और उनकी पत्नी अपने कुकर्मों के कारण इस योग्य थे कि उनको क़त्ल कर दिया जाता परन्तु यह हमारे प्रिय नबी हज़रत मुहम्मदस.अ.व की महानता और दया का एक छोटा सा उदाहरण है आपने फ़रमाया कि:

आज के दिन जो व्यक्ति अबु सुफ़ियान के घर में प्रवेश कर लेगा उसको भी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। जो व्यक्ति हथियार फेंक देगा उसको भी सुरक्षा प्रदान की जाएगी, जो व्यक्ति अपने घर के दरवाज़े बंद कर लेगा उसको भी सुरक्षा प्रदान की जाएगी।[5]

अतः जब मक्का वाले आपकी सेवा में उपस्थित किए गए तो आपस.अ.व ने फ़रमाया — हे मक्का के लोगो! तुम ने देख लिया कि ख़ुदा तआला के चमत्कार किस प्रकार अक्षरशः पूरे हुए हैं। अब बताओ कि तुम्हारे उन अत्याचारों और उपद्रवों का क्या दण्ड दिया जाए जो तुम ने एक ख़ुदा की उपासना करने वाले निर्धन बन्दों पर किए थे। मक्का के लोगों ने कहा — हम आप से उसी आचरण की आशा रखते हैं जो यूसुफ ने अपने भाइयों से किया था। यह ख़ुदा की क़ुदरत थी कि मक्का वालों के मुख से वही शब्द निकले जिन की भविष्यवाणी ख़ुदा तआला ने सूरह ‘यूसुफ़’ में पहले से कर रखी थी तथा मक्का-विजय से दस वर्ष पूर्व बता दिया था कि तू मक्का वालों से वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा यूसुफ़ ने अपने भाइयों से किया था। अतः जब मक्का वालों के मुख से इस बात की पुष्टि हो गई कि रसूले करीमस.अ.व यूसुफ़ के प्रारूप थे तथा यूसुफ़ के समान अल्लाह तआला ने उन्हें अपने भाइयों पर विजय प्रदान की थी उसके बाद नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो फैसला सुनाया उसका उदाहरण न इतिहास प्रस्तुत कर सकता है न वर्तमान और भविष्य भी ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने में सदैव अस्मर्थ रहेगा। आपने अपने समस्त शत्रुओं को एक क्षण में क्षमा कर दिया और आपस.अ.व ने घोषणा कर दी कि:

لا تَثْرَيبَ عَلَيْكُمُ  تااللہ

अर्थात ख़ुदा की क़सम आज तुम्हें किसी प्रकार का दण्ड नहीं दिया जाएगा और न किसी प्रकार से डांटा जाएगा।[6]

اذهبوا فأنتم الطلقاء

अर्थात चले जाओ तुम सब आज़ाद हो।

अल्लाह के प्यारे नबी और समस्त लोकों के लिए रहमत हज़रत मुहम्मदस.अ.व के पवित्र जीवन का यह केवल एक उदाहरण है अन्यथा आपके जीवन का एक-एक पल ऐसे अनगिनत उदाहरणों का साक्षी है अतः जब मक्का के लोगों ने आपस.अ.व की बातें सुनने से ही इन्कार कर दिया और यह निर्णय कर लिया कि मारो-पीटो परन्तु बात बिल्कुल न सुनो तो आप ने तायफ़ की ओर ध्यान दिया। जब आप तायफ़ पहुँचे तो वहाँ के सरदार आप से मिलने के लिए आने लगे, परन्तु कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकार करने कि लिए तैयार न हुआ। वे एक दिन एकत्र हुए और अपने साथ कुत्ते लिए, तथा लड़कों को उकसाया तथा अपनी झोलियाँ पत्थरों से भर लीं और बड़ी निर्दयता से रसूले करीमस.अ.व पर पथराव आरम्भ किया, वे रसूले करीमस.अ.व को शहर से ढकेलते हुए बाहर ले गए। आप के पैर खून से लथपथ हो गए तथा ज़ैद भी आप को बचाते-बचाते बहुत घायल हो गए, परन्तु अत्याचारियों का हृदय शान्त न हुआ, वे आपके पीछे चलते गए, चलते गए यहाँ तक कि आप शहर से कई मील दूर की पहाड़ियों तक पहुँच गए। उन्होंने आप का पीछा न छोड़ा। जब ये लोग आप का पीछा कर रहे थे तो आप इस भय से कि ख़ुदा का आक्रोश उन पर न भड़क उठे आकाश की ओर दृष्टि उठा कर देखते और नितान्त आर्द्रता पूर्वक दुआ करते:

हे मेरे ख़ुदा! इन लोगों को क्षमा कर कि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।[7]

उपरोक्त घटना का वर्णन करते हुए हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि उन्होंने मुहम्मदस.अ.व से पूछा कि क्या उहुद के दिन से अधिक भी आपके लिए कोई कठिन दिन था। आप ने फ़रमाया कि “जो आपके लोगों की ओर से मुझे पहुंचा, वह तो पहुंचा ही, परन्तु उनकी ओर से सबसे कष्टमय ‘आरफा का दिन था जब मैं इब्न’ अब्द अल-यालील इब्न ‘अब्द अल-कलाल के पास गया। जिस बात का मैंने निश्चय किया हुआ था उसका उन्होंने उत्तर नहीं दिया। मैं इस स्थिति में वापस लौटा कि मेरे चेहरे पर उदासी थी। मैं निरन्तर चलता रहा यहाँ तक कि मैं कर्ण अस्सालिब नामक स्थान पर पहुँचा। आप फ़रमाते हैं कि इस स्थान पर आकर मैंने अपना सिर ऊपर उठाया तो क्या देखता हूँ कि एक बादल के टुकड़े ने मुझ पर साया किया हुआ है और उसमें जिब्रील फ़रिश्ता है। जिब्रील ने मुझे कहा कि आपके बारे में अल्लाह तआला ने इस क़ौम की बातें सुन ली हैं। और उनके कुकर्म भी देख लिए हैं अल्लाह तआला ने आपके पास पहाड़ों का फ़रिश्ता भेजा है कि आप इन ताइफ़ के लोगों के बारे में उसे जो चाहें आदेश दें। अतः पहाड़ों के फ़रिश्ते ने मुझे पुकारा और मुझ पर सलामती भेजी और कहा कि यदि आप आदेश दें तो मैं इन पर दोनों पहाड़ गिरा दूँ। आपने फ़रमाया, “नहीं नहीं बिल्कुल नहीं, मैं आशा करता हूँ कि अल्लाह तआला इनकी सन्तान में से ऐसे लोग पैदा कर देगा जो एक अल्लाह की इबादत (उपासना) करेंगे और उसके अतिरिक्त किसी की उपासना नहीं करेंगे”।[8]

इसी प्रकार इतिहास और हदीस की पुस्तकों में वर्णन है कि हज़रत मुहम्मदस.अ.व ने अपनी प्यारी बेटी के हत्यारे को भी क्षमा कर दिया अतः उल्लेख आता है कि,

एक व्यक्ति हब्बार बिन अस्वद नामक ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की प्यारी बेटी हज़रत ज़ैनबरज़ि॰ पर मक्का से मदीना हिजरत (प्रवास) करते समय भाले से आक्रमण किया। आप उस समय गर्भवती थीं। इस हमले के कारण आपका गर्भपात हो गया और आपको बहुत गहरी चोट आई जिसके कारण आपका देहान्त हो गया। फतह मक्का के बाद जब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना आए तो हब्बार आपकी सेवा में उपस्थित हुआ और गिड़गिड़ाने लगा कि मैं आप से दया की भीख मांगता हूँ। फतह मक्का के समय में भाग गया था परन्तु आपकी दया और रहम मुझे खींच लाया है। हे अल्लाह के नबी! मैं अपने पापों को स्वीकार करता हूँ आप मुझे क्षमा कर दें। अतः आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी बेटी के हत्यारे को क्षमा कर दिया।[9]

आपस.अ.व के सहाबी हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाहरज़ि॰ वर्णन करते हैं कि:

एक बार हम ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ नजद (स्थान का नाम) की ओर यात्रा की। फिर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हम लोग बड़े कांटेदार पेड़ों वाली घाटी में पहुंचे। आप एक पेड़ के नीचे लेट गए और अपनी तलवार को उस पेड़ की एक शाख से लटका दिया। बाकी साथी विश्राम करने के उद्देश्य से दूसरे पेड़ों की छाया में इधर-उधर बिखर गए। फिर जब सहाबा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए, तो आपने फ़रमाया कि “जब मैं सो रहा था, तो एक आदमी मेरे पास आया और उसने तलवार उठा ली। जब मैं उठा, तो मैंने देखा कि वह आदमी मेरे सिर पर हाथ में तलवार लेकर खड़ा है। उसने मुझसे पूछा: (हे मुहम्मद!) अब आपको मुझसे कौन बचाएगा? मैंने उत्तर दिया: अल्लाह, यह सुनकर वह भयभीत हो गया और उसके हाथ से तलवार नीचे गिर गई, अतः वह व्यक्ति यह बैठा है और फिर पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उससे किसी प्रकार का कोई बदला नहीं लिया।[10]

इतिहास में यह भी वर्णन मिलता है कि वह व्यक्ति अपने कबीले की ओर गया और उनसे कहा कि आज मैं ऐसे व्यक्ति से मिल कर आया हूँ जो धरती पर सबसे दयावान है और यही बात उस व्यक्ति के इस्लाम स्वीकार करने का कारण बनी।

जिन लोगों ने इस्लामी इतिहास का अध्ययन किया है उनसे यहूदियों द्वारा मुसलमानों को दिए गए कष्ट और उनके अत्याचार छुपे नहीं हैं और न ही उनको वर्णन करने की आवश्यकता है अर्थात यह एक स्पष्ट सत्य है परन्तु जो व्यवहार नबी करीमस.अ.व ने उनके साथ किया और अपनी उदारता, क्षमा, दया और सहिष्णुता का जो उदाहरण आपने प्रस्तुत किया उसका वर्णन करना भी अति आवश्यक है।

एक दिन यहूदियों का एक समूह हज़रत मुहम्मदस.अ.व की सेवा में आया और उन्होंने (السَّلَامْ عَلَیکْم – अर्थात आप पर शांति हो – की बजाय) اَلسَّامْ عَلَیکِم’’ कहा (अर्थात तुम बर्बाद हो जाओ) हज़रत आयशा ने फ़रमाया कि मैं समझ गई और मैंने कहा कि बर्बाद तुम हो जाओ और उन्हें बुरा भला कहा परन्तु हज़रत मुहम्मदस.अ.व ने फ़रमाया: हे आयशा ठहरो ‘اِنَ اللہَ یْحِبّْ الرِّفقَ فِی الاَمرِ کْلِّہ’’ अल्लाह हर मामले में उदारता पसंद करता है। मैंने कहा, हे अल्लाह के रसूल, क्या आपने यह नहीं सुना कि उन्होंने क्या कहा था?[11]

इसी प्रकार फ़तेह ख़ैबर के अवसर पर एक यहूदी औरत ने आपका सत्कार किया और बकरी के माँस में विष मिला कर आपको दिया आपने थोड़ा सा खाया तो आपको उसमें कुछ मिला होने का आभास हुआ जब उस औरत को आपके पास लाया गया तो उसने अपना जुर्म स्वीकार किया कि उसका उद्देश्य आपको क़त्ल करना था। आपके सहाबा ने कहा कि हे अल्लाह के रसूल! क्यों न हम इसे क़त्ल कर दें। आपस.अ.व ने फ़रमाया नहीं और आपने उस औरत को क्षमा कर दिया।[12]

इसी प्रकार हदीस में वर्णन है कि:

एक बार नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निकट से एक यहूदी व्यक्ति का जनाज़ा गुज़रा तो आप उसके (सम्मान में) खड़े हो गए। आपको बताया गया कि यह तो एक यहूदी का जनाज़ा था इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, “क्या वह इन्सान नहीं था?”[13]

इसी प्रकार वर्णन है कि,

ज़ैद बिन सअना नामक एक यहूदी से आपने क़र्ज़ लिया था लेकिन वह व्यक्ति समय से पहले ही क़र्ज़ लेने पहुँच गया और आपके लिए अत्यधिक कठोर शब्दों का उपयोग किया लेकिन आप मुस्कुराते रहे। हज़रत उमर रज़िअल्लाह ने जब उसको कठोर शब्दों में उत्तर दिया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत उमर को मना फ़रमाया और आदेश दिया कि इस व्यक्ति का क़र्ज़ अदा कर दिया जाए और हज़रत उमर के कठोर शब्द कहने की वजह से 60 किलो ज़्यादा जौ देने का आदेश दिया।[14]

हज़रत मुहम्मदस.अ.व ने अपने शत्रुओं के साथ न केवल सामान्य परिस्थितियों में दया और सहिष्णुता का व्यवहार किया बल्कि युद्ध के समय में भी उनके अधिकारों की रक्षा की। युद्ध की स्थिति में भी नबीस.अ.व ने अच्छे व्यवहार के ऐसे उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किए कि मानव बुद्धि उन्हें देखकर दंग जाती है अतः बदर की जंग के अवसर पर जब मुसलमानो ने पानी के झरनो पर होज़ बना कर वहां पड़ाव डाल लिया तो युद्ध की स्थिति में भी जब शत्रु पानी लाने गया, तो आपने फ़रमाया, “उन्हें पानी लेने दो”[15]

फिर इसी जंग-ए-बदर में जो क़ैदी पकड़े गए थे उनमें रसूले करीमस.अ.व के चाचा अब्बासरज़ि॰ भी थे जो हमेशा आप का साथ दिया करते थे। मक्का वाले उन्हें विवश करके अपने साथ युद्ध के लिए ले आए थे। इसी प्रकार क़ैदियों में रसूल करीमस.अ.व की बड़ी बेटी के पति अबुलआस भी थे। मदीना की ओर वापस आते हुए रात को जब आप सोने के लिए लेटे तो सहाबारज़ि॰ ने देखा कि आप को नींद नहीं आ रही। अतः उन्होंने विचार करके यह परिणाम निकाला कि आप के चाचा अब्बासरज़ि॰ क्योंकि रस्सियों में जकड़े होने के कारण सो नहीं सकते और उनके कराहने की आवाज़ें आती हैं इसलिए उनके कष्ट के विचार से आप को नींद नहीं आती। उन्होंने आपस में परामर्श करके हज़रत अब्बासरज़ि॰ के बन्धनों को ढीला कर दिया। हज़रत अब्बासरज़ि॰ सो गए और रसूले करीमस.अ.व को भी नींद आ गई। थोड़ी देर के पश्चात सहसा घबरा कर आप की आँख खुली और आपस.अ.व ने पूछा अब्बासरज़ि॰ ख़ामोश क्यों हैं, उनके कराहने की आवाज़ क्यों नहीं आती? आप के हृदय में यह भ्रम उत्पन्न हुआ कि कदाचित कष्ट के कारण वह बेहोश हो गए। सहाबारज़ि॰ ने कहा हे अल्लाह के रसूल! हमने आपके कष्ट को देखकर उनके बन्धन ढीले कर दिए हैं। आपस.अ.व ने फ़रमाया — नहीं, नहीं यह अन्याय नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार अब्बास मेरे सम्बन्धी हैं अन्य क़ैदी भी दूसरों के परिजन हैं या तो सब क़ैदियों के बंधन ढीले कर दो ताकि वे आराम से सो जाएं और या फिर अब्बासरज़ि॰ के भी बन्धन कस दो। सहाबारज़ि॰ ने आपस.अ.व की बात सुनकर सब क़ैदियों के बंधन ढीले कर दिए तथा सुरक्षा का पूर्ण दायित्व अपने ऊपर ले लिया। जो लोग क़ैद हुए थे उनमें से जो पढ़ना जानते थे आपस.अ.व ने उनका केवल यही फ़िदया (मुक्त राशि) निर्धारित किया कि वे मदीना के दस-दस लड़कों को पढ़ना सिखा दें अर्थात् जिन को मुक्त कराने हेतु धन राशि देने वाला कोई नहीं था उन्हें यों ही आज़ाद कर दिया, वे धनवान लोग जो फ़िदया दे सकते थे उन से उचित फ़िदया लेकर छोड़ दिया और इस प्रकार इस प्राचीन दास प्रथा को जिसमें क़ैदियों को दास बना कर रखा जाता था, समाप्त कर दिया।[16]

वर्तमान काल में भी जबकि प्रत्येक क़ौम स्वयं को एक सभ्य, आधुनिक और मानवता की सरंक्षक क़ौम होने का दम भरती है जंग की स्थिति में जो व्यवहार शत्रुओं के साथ करती है वह किसी से छुपा नहीं है और न ही उसके वर्णन की आवश्यकता है। न मानवता के अधिकारों का सम्मान किया जाता है और न ही किसी नियमावली का। न ही किसी की धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाता है और न ही सांसारिक भवनाओं का। शुत्रुओं पर विजय प्राप्त करना और उन्हें असहनीय और कठोर से कठोर दण्ड देना और उनसे अमानवीय व्यवहार करना प्रथम उद्देश्य होता है जिसके लिए साम, दाम, दण्ड भेद प्रत्येक निति को अपनाया जाता परन्तु नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अपने शत्रुओं से सहिष्णुता, दया और मानवता का यह सर्वश्रेष्ठ व्यवहार आज भी सभ्य से सभ्य क़ौम के लिए एक मार्गदर्शक है। अतः हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया  कि:

एक गैर-मुस्लिम के शरीर को विकृत या क्षत विक्षत नहीं किया जाए, उसे बाँध कर न मारा जाए उसे जलाया न जाए इत्यादि। अर्थात उसके साथ ऐसी कोई कार्यवाही न की जाए जो मानवता के विरुद्ध हो।[17]

फ़िर फ़रमाया:

وَلَا تَمْثْلَوا : अर्थात मुस्ला मत करो जबकि मुस्ला की रस्म अरबों के बीच सामान्य बात थी। अर्थात् युद्ध में, शत्रुओं की लाशों के नाक, कान आदि को काटकर, उनकी शक्ल को बिगाड़ने के लिए। परन्तु आप ने अपने अनुयायियों को बहुत सख्त हिदायत दी कि वह उनका मुस्ला न करे और इस तरह आपने गैर-मुसलमानों के मुर्दों के लिए भी सम्मान बनाए रखा।[18]

इसी प्रकार जंग-ए-ख़न्दक में ख़न्दक़ फांदते समय काफ़िरों का नौफ़िल नामक एक बहुत बड़ा सरदार मारा गया। यह इतना बड़ा सरदार था कि क़ाफ़िरों ने यह विचार किया कि यदि उसके शव का अपमान हुआ तो अरब में हमारे लिए मुँह दिखाने का कोई स्थान नहीं रहेगा। अतः उन्होंने रसूलुल्लाहस.अ.व. के पास सन्देश भेजा कि यदि आप उसका शव हमें दे दें तो वे आपको दस हज़ार दिरहम देने के लिए तैयार हैं। उन लोगों का विचार तो यह था कि जिस प्रकार हम ने मुसलमान सरदारों अपितु स्वयं रसूलुल्लाहस.अ.व के चाचा के नाक-कान उहद युद्ध में काट दिए थे, कदाचित इसी प्रकार आज मुसलमान भी हमारे इस सरदार के नाक-कान काट कर हमारी क़ौम का अपमान करेंगे परन्तु इस्लामी आदेश तो इससे बिल्कुल भिन्न हैं। इस्लाम शवों के अपमान की आज्ञा नहीं देता। अतः काफ़िरों का सन्देश मुहम्मद रसूलुल्लाहस.अ.व के पास पहुँचा तो आपस.अ.व ने फ़रमाया — इस शव का हमने क्या करना है, यह शव हमारे किस काम का है कि इसके बदले में हम तुम से कोई मूल्य लें। अपना शव बड़े आराम से उठाकर ले जाओ। हमें इस से कोई मतलब नहीं।[19]

एक जंग के अवसर पर कुछ मुसलमानों ने शत्रुओं के बच्चो को क़त्ल कर दिया यह बात जब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक पहुँची तो आपने फ़रमाया कि आश्चर्य होता है उन लोगों पर जिनके क़त्ल की दशा यहाँ तक पहुँच गई कि उन्होंने बच्चों को क़त्ल कर दिया? अतः उन्हें हो क्या गया है? सावधान बच्चों को हरगिज़ क़त्ल न करना, सावधान बच्चों को कदापि-कदापि क़त्ल न करना।[20]

हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाहस.अ.व की पवित्र जीवनी के यह बहुत थोड़े से उदाहरण हैं अन्यथा आपकी पवित्र जीवनी के प्रत्येक शब्द से यही ध्वनि सुनाई देती है कि

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ

और हमने तुझे समस्त लोकों के लिए रहमत बना कर भेजा है।[21]

जो व्यक्ति भी घृणा और पक्षपात से मुक्त होकर हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाहस.अ.व की पवित्र जीवनी का अध्ययन करेगा निःसंदेह उसका ह्रदय भी यही गवाही देगा किआप समस्त लोकों के लिए रहमत बना कर भेजे गए हैं।

हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि वह हम सबको सत्य और निष्ठा के मार्ग पर चलते हुए घृणा और पक्षपात से मुक्त होकर हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाहस.अ.व की पवित्र जीवनी का अध्ययन करने और हमें आपके पवित्र मार्गदर्शन में आपके आदेशानुसार अपना जीवन व्यतीत करने का सामर्थ्य प्रदान करे। आमीन।


लेखक जामिआ अहमदिया – अहमदिया धार्मिक संस्थान – से स्नातक हैं और उत्तर प्रदेश में प्रचारक के रूप में कार्यरत हैं।


सन्दर्भ

[1] पवित्र क़ुरआन सूरः अल-अहज़ाब आयत 22

[2] सहीह इब्न-ए-हिब्बान हदीस 973

[3] अल-अदब अल-मुफ़रद हदीस 321

[4] सीरतुल हलबिय्यह जिल्द. 3, पृष्ठ. 93

[5] सहीह मुस्लिम किताबुल जिहाद वस्सैर

[6] हज़रत मुहम्मद स का पवित्र जीवन 231, 232

[7] हज़रत मुहम्मदस.अ.व का पवित्र जीवन, पृष्ठ 46,47

[8] बुख़ारी

[9] तारीख़-उल-ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ. 93

[10] बुख़ारी हदीस- 3905

[11] सही बुखारी हदीस: 5565

[12] बुखारी हदीस : 2474

[13] सही बुखारी

[14]

[15] सीरत इब्न-ए-हिशाम पृष्ठ. 424

[16] हज़रत मुहम्मदस. अ. व. का पवित्र जीवन 94-96

[17]

[18] सही मुस्लिम हदीस: 3261

[19] अस्सीरतुल हलबिय्यह जिल्द. 2 पृष्ठ. 345

[20] निसाई हदीस: 8616

[21] पवित्र क़ुरआन सूरः अल अम्बिया आयत 108

2 टिप्पणियाँ

Samiur Rahman · अगस्त 13, 2021 पर 7:32 अपराह्न

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيد ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آل مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيد.

Samiur Rahman · अगस्त 13, 2021 पर 7:34 अपराह्न

Masha Allah

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