स्त्री शिक्षा: समाज के सशक्तीकरण और विकास की आधारशिला

आज भी जब आधुनिक दुनिया स्त्री शिक्षा के अधिकार पर बहस कर रही है, इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले ज्ञान प्राप्ति को महिलाओं का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि उनका सामाजिक कर्तव्य बनाकर नारी अधिकारों में एक युगांतरकारी परिवर्तन की नींव रखी थी।

नईमा आरिफ़, सिकंदराबाद

मूल अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़ें।

स्त्री शिक्षा का महत्व दुनिया भर में सदियों से गंभीर विमर्श और बदलाव का विषय रहा है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैरियट मार्टिनो का यह विचार आज भी बेहद प्रासंगिक है कि “पुरुषों की तरह ही स्त्रियों की शिक्षा का उद्देश्य भी उन्हें कर्मठ और आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए; अन्यथा उनके अध्ययन को वास्तविक शिक्षा नहीं कहा जा सकता।” यह कथन स्पष्ट करता है कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान का नाम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी साधन है।

इस वैश्विक समझ के बावजूद, भारत में महिला साक्षरता की दर अभी भी वैश्विक औसत से काफ़ी पीछे है। जहाँ विश्व स्तर पर लगभग 85 प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं, वहीं भारत में यह आँकड़ा केवल 71 प्रतिशत के आसपास सिमटा हुआ है।[1] यह अंतर उन गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक बेड़ियों को उजागर करता है, जो आज भी लड़कियों के ज्ञान के अधिकार की राह में रुकावट बनी हुई हैं।

इतिहास के पन्ने पलटें तो स्त्री को हमेशा दमन का शिकार होना पड़ा, उसे दोयम दर्जे का नागरिक समझा गया और उसके बुनियादी अधिकारों तक को छीन लिया गया। दुनिया के विभिन्न समाजों में कभी वह दौर भी था जब पति की चिता पर जीवित स्त्री को झोंक दिया जाता था, नवजात बच्चियों को पैदा होते ही ज़िंदा दफ़न कर दिया जाता था, और औरत को महज़ भोग की वस्तु या दासी समझ लिया गया था।

यद्यपि समय के साथ दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया—विशेषकर पिछली कुछ सदियों में—लेकिन इतिहास गवाह है कि चौदह सौ साल से भी पहले इस्लाम ने नारी अधिकारों की वकालत करते हुए एक युगांतरकारी क्रांति का सूत्रपात किया था। उसने स्त्री और पुरुष के समान मानवीय सम्मान की नींव रखी, बेटियों को बोझ समझने की संकीर्ण मानसिकता को बदलकर उन्हें ईश्वरीय वरदान (रहमत) का दर्जा दिया, और समाज की प्रगति में महिलाओं को अनिवार्य स्तंभ के रूप में स्वीकार किया।

ज्ञान के क्षेत्र में पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) ने स्त्री और पुरुष को एक समान स्तर पर रखा और हर आस्तिक के लिए इल्म (ज्ञान) हासिल करना उसका धार्मिक दायित्व घोषित किया।[2] यह आदेश केवल काग़ज़ी नहीं था, बल्कि उनके दौर की महिलाओं के जीवन में साफ़ झलकता था। उनकी पत्नियों और महिला सहाबियों (साथियों) ने ज्ञान और कर्म के हर क्षेत्र में मिसाल क़ायम की—वे केवल कुशल गृहणी नहीं थीं, बल्कि प्रख्यात विद्वान, सफल व्यापारी, कुशल चिकित्सक और युद्धक्षेत्र में सेवाएँ देने वाली वीरांगनाएँ थीं।

शिक्षा किसी भी सुदृढ़ समाज की नींव होती है, और जब एक स्त्री शिक्षित होती है, तो उसका लाभ पूरे समाज को मिलता है। एक मशहूर कहावत है: “जब आप एक पुरुष को शिक्षित करते हैं, तो सिर्फ़ एक व्यक्ति शिक्षित होता है; लेकिन जब आप एक स्त्री को शिक्षित करते हैं, तो पूरी पीढ़ी को शिक्षित करते हैं।” यह विचार स्त्री शिक्षा के उस दूरगामी प्रभाव को रेखांकित करता है जो व्यक्तिगत विकास से आगे बढ़कर परिवारों, समाजों और पूरे राष्ट्र को नई ऊँचाई देता है।

शिक्षा ही वह शक्ति है जो महिलाओं को सामाजिक कुरीतियों से लड़ने, ग़रीबी के दुष्चक्र को तोड़ने, जबरन विवाहों का विरोध करने और भावी पीढ़ी का स्वस्थ लालन-पालन करने में सक्षम बनाती है। एक शिक्षित महिला अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देती है और सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाती है।

इतिहास और वर्तमान में ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं जहाँ शिक्षित महिलाओं ने समाज को नई दिशा दी। सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई ने बालिका शिक्षा के लिए वैश्विक आवाज़ उठाई। भारत में महिला शिक्षा की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक भेदभाव और तिरस्कार से लड़ते हुए लड़कियों के लिए स्कूल खोले, वहीं मारिया मॉन्टेसरी ने प्रारंभिक बाल-शिक्षा की पूरी अवधारणा को ही बदल दिया। ये महिलाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि शिक्षा किस तरह जिंदगियों और समाजों का कायाकल्प कर सकती है।

हालाँकि, आज भी युद्ध, आंतरिक संघर्ष और पर्यावरणीय आपदाओं के कारण लड़कियों की शिक्षा गंभीर संकट में है। फ़िलिस्तीन, फ़िलीपींस और प्रशांत द्वीप समूह जैसे क्षेत्रों में जारी संकटों ने महिलाओं और बालिकाओं के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। युद्ध की विभीषिका में सबसे बड़ा आघात महिलाओं पर ही पड़ता है, जबकि शांति की स्थापना में उनकी भूमिका सबसे अहम होती है। शोध बताते हैं कि जब शांति समझौतों में महिलाओं को शामिल किया जाता है, तो वे समझौते कहीं अधिक समावेशी, न्यायसंगत और टिकाऊ साबित होते हैं।[3] मानवाधिकारों के सम्मान के बिना सच्ची शांति संभव नहीं है, और शांति के बिना इन अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकती।

ज्ञान, नेतृत्व और शांति स्थापना में महिलाओं की यह केंद्रीय भूमिका इस्लाम के शुरुआती दौर से ही स्पष्ट रही है। हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) और हज़रत आइशा (रज़ि.) जैसी महान और धर्मपरायण हस्तियों ने बुद्धिमत्ता, नेतृत्व और ज्ञान का जो आदर्श स्थापित किया, वह आज भी प्रेरणा देता है। उन्होंने न केवल पैग़ंबर-ए-इस्लाम (स.) के मिशन में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग दिया, बल्कि ज्ञान और समर्पण के साथ हज़ारों लोगों का मार्गदर्शन भी किया।

आगे चलकर, अहमदिया मुस्लिम जमाअत में भी—जिसकी स्थापना इस्लाम के पुनर्जागरण की भविष्यवाणी के अनुरूप हुई—हज़रत सैय्यदा नुसरत जहाँ बेगम (रज़ि.) और हज़रत अमतुल हई बेगम (रज़ि.) जैसी प्रबुद्ध महिलाओं ने शिक्षा और सामाजिक नेतृत्व की मिसालें पेश कीं। ये ऐतिहासिक प्रमाण दोहराते हैं कि इस्लाम ने हमेशा नारी शिक्षा और उनके सम्मान को सर्वोपरि रखा है।

यूनेस्को (UNESCO) में अपने एक संबोधन के दौरान अहमदिया मुस्लिम जमाअत के वर्तमान सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रमुख और पाँचवें ख़लीफ़ा हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाह) ने स्त्री शिक्षा पर बल देते हुए कहा था:

“इस्लाम ने सबसे पहले महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों की नींव रखी। उस दौर में जब स्त्रियों के साथ भेदभाव किया जाता था और उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था, इस्लाम के पैग़ंबर (स.) ने अपने मानने वालों को आदेश दिया कि वे लड़कियों की बेहतर शिक्षा और उनके सम्मान को सुनिश्चित करें।”[4]

उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि अहमदिया जमाअत के माध्यम से आज पूरी दुनिया में इस भावना को जीवित रखा जा रहा है, जहाँ अहमदी लड़कियाँ विभिन्न क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर, शिक्षिका, वास्तुकार और अन्य पेशेवर बनकर मानवता की सेवा में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

शिक्षा कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि हर इंसान का बुनियादी अधिकार है। ज्ञान के माध्यम से महिलाओं का सशक्तिकरण एक न्यायपूर्ण, समृद्ध और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए अपरिहार्य है। शिक्षित नारी न केवल अपना भाग्य बदलती है, बल्कि अपने परिवेश और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी नई रोशनी से भर देती है।

यद्यपि शत-प्रतिशत बालिका शिक्षा का लक्ष्य अभी अधूरा है, किंतु इतिहास साक्षी है कि शिक्षित महिलाएँ हमेशा प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी।

सन्दर्भ

[1] विश्व बैंक के आंकड़ों (2024 अपडेट) और यूनेस्को सांख्यिकी संस्थान (UIS) के अनुमानों के अनुसार, भारत में महिला साक्षरता दर लगभग 71 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह लगभग 85 प्रतिशत आंकी गई है।

[2] सुनन इब्न माजा, किताब अल-मुकद्दिमा (किताबुस-सुन्नत)

[3] Women’s Participation in Peace Negotiations and the Durability of Peace, Jana Kruase et al. (2018), International Interactions

[4] Islamic Principles on Education and Serving Humanity, (शिक्षा और मानवता की सेवा पर इस्लामी सिद्धांत), हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाह) द्वारा यूनेस्को मुख्यालय, पेरिस (फ़्रांस) में दिया गया ऐतिहासिक संबोधन, 8 अक्टूबर 2019

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