मुज़फ़्फ़र अहमद, अध्यक्ष, अहमदिया मुस्लिम जमाअत, तिरुवनंतपुरम
तिरुवनंतपुरम के गवर्नमेंट कॉलेज फॉर विमेन में 25 जून 2026 को “विज्ञान, धर्म और साहित्य के बीच संबंध” (The Relationship Between Science, Religion, and Literature) विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम ‘अंडर द ग्रीनवुड ट्री इंग्लिश क्लब‘ के तत्वावधान में अहमदिया मुस्लिम जमाअत, तिरुवनंतपुरम के सहयोग से आयोजित हुआ। इसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया।
जमाअत के राष्ट्रीय प्रतिनिधि श्री हुसाम अहमद ने मुख्य भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने मानव इतिहास में विज्ञान की प्रगति और विकास में धर्म की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया। ग्रीक सभ्यता, प्राचीन भारतीय दर्शन और इस्लामी स्वर्ण युग के ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक अनुसंधान की मशाल को हमेशा धर्म और आस्था से जुड़े विचारकों ने आगे बढ़ाया; जबकि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में विज्ञान के औद्योगिकीकरण से पहले तक अधार्मिक या नास्तिक विचारकों का योगदान विज्ञान के क्षेत्र में न्यूनतम था।
पवित्र क़ुरआन किस प्रकार मानव जाति को वैज्ञानिक खोजों की प्रेरणा देता है, इस पर विस्तार से बात रखते हुए उन्होंने कहा कि धर्म ईश्वर की वाणी (Word of God) है, जबकि विज्ञान ईश्वर की कृति (Work of God) है। इसलिए ईश्वरीय प्रकाशना (वही) और स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों के मध्य कोई बुनियादी टकराव नहीं हो सकता। उन्होंने समझाया कि यदि कोई प्रत्यक्ष विरोधाभास दिखाई देता है, तो वह त्रुटि या तो प्रकाशना की मानवीय व्याख्या में है या फिर वैज्ञानिक समझ में, न कि ईश्वर की मूल वाणी अथवा उसकी रचना में।
साहित्य की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने विशेष रूप से अहमदिया मुस्लिम जमाअत के संस्थापक हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (अ.) की महानतम कृति ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उस दौर में लिखी गई थी जब धार्मिक वर्ग आस्था और तर्कसंगत विवेक के बीच कड़े अलगाव की वकालत कर रहा था, वहीं दूसरी ओर चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ जैसी रचनाएँ पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को चुनौती दे रही थीं। ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ ने वास्तविक ज्ञान की खोज में ईश्वरीय मार्गदर्शन और विवेक (तर्क) की पूरक भूमिका को स्थापित किया।
मुख्य वक्तव्य के बाद श्रोताओं को अपने विचार साझा करने और प्रश्न पूछने का अवसर दिया गया। वक्ता ने उपस्थित प्रतिभागियों के सवालों के संतोषजनक उत्तर दिए, जिससे कार्यक्रम में एक जीवंत और विचारोत्तेजक संवाद हुआ।
यह सेमिनार विशेष रूप से इस समकालीन भ्रांति को दूर करने में एक सार्थक और उपयोगी मंच साबित हुआ कि धर्म और विज्ञान स्वभावतः एक-दूसरे के विरोधी हैं। कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को आस्था, तर्क, वैज्ञानिक अनुसंधान और साहित्य के बीच गहरे सामंजस्य पर विचार करने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान किया।
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