देश-भक्ति एवं देश-प्रेम के सम्बन्‍ध में इस्लामी शिक्षाएं

विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत आज विश्व के 206 देशों में फैल चुकी है और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं के आधार पर पूरे विश्व में शान्ति, प्रेम, भ्रातृत्व और देश के प्रति वफ़ादारी को बढ़ावा दे रही है। विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के अगुवा एवं प्रमुख हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहिब इस सन्देश को पूरे विश्व में फैला रहे हैं। आपके भाषणों में से कुछ उद्धरण इस सम्बन्‍ध में प्रस्तुत हैं।

देश-भक्ति एवं देश-प्रेम के सम्बन्‍ध में इस्लामी शिक्षाएं

विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत आज विश्व के 206 देशों में फैल चुकी है और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं के आधार पर पूरे विश्व में शान्ति, प्रेम, भ्रातृत्व और देश के प्रति वफ़ादारी को बढ़ावा दे रही है। विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के अगुवा एवं प्रमुख हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहिब इस सन्देश को पूरे विश्व में फैला रहे हैं। आपके भाषणों में से कुछ उद्धरण इस सम्बन्‍ध में प्रस्तुत हैं।

विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत आज विश्व के 200 से अधिक देशों में फैल चुकी है और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं के आधार पर पूरे विश्व में शान्ति, प्रेम, भ्रातृत्व और देश के प्रति वफ़ादारी को बढ़ावा दे रही है। विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के अगुवा एवं प्रमुख हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहिब इस सन्देश को पूरे विश्व में फैला रहे हैं। आपके भाषणों में से कुछ उद्धरण इस सम्बन्‍ध में प्रस्तुत हैं।

हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहिब फ़रमाते हैं कि:

देश-प्रेम

अपने देश से वफ़ादारी या प्रेम के शब्‍द केवल बोलना या सुनना बड़ा सरल है परन्‍तु वास्‍तव में इन शब्‍दों में ऐसे अर्थ निहित हैं जो बहुत गूढ़ और व्यापक हैं फिर उन शब्‍दों के अर्थों को पूर्ण रूप से परिधि में लेना और इस बात को समझना कि शब्‍दों के वास्‍तविक अर्थ क्‍या हैं और उनकी मांग क्‍या है एक कठिन कार्य है। हम देश-प्रेम और देशभक्ति के संबंध में इस्लामी विचारधारा का संक्षेप में वर्णन करने का प्रयत्न करेंगे।

देश के प्रति वफ़ादारी

सर्वप्रथम इस्‍लाम का एक मूल सिद्धान्‍त यह है कि एक व्‍यक्ति के शब्‍दों और कर्मों से किसी भी प्रकार की भिन्‍नता या विरोधाभास कदापि प्रकट नहीं होना चाहिए। वास्‍तविक वफ़ादारी एक ऐसे संबंध की मांग करती है जो निष्‍कपटता और सच्चाई पर आधारित हो। यह इस बात की मांग करती है कि प्रत्‍यक्षत: एक व्‍यक्ति जो प्रकट करता है वही उसके अन्‍त:करण में भी हो। राष्ट्रीयता के संदर्भ में इन सिद्धान्‍तों का बहुत महत्त्व है। अत: किसी भी देश के नागरिक के लिए यह नितान्‍त आवश्‍यक है कि वह अपने देश से सच्‍ची वफ़ादारी के संबंध स्‍थापित करे। इस बात का कुछ महत्त्व नहीं है कि चाहे वह जन्‍मजात नागरिक हो अथवा उसने अपने जीवन में बाद में नागरिकता प्राप्‍त की हो, या प्रवास करके नागरिकता प्राप्‍त की हो या किसी अन्‍य माध्‍यम से।

ख़ुदा के पैग़म्बर

वफ़ादारी एक उच्‍चकोटि की विशेषता है और वे लोग जिन्‍होंने इस विशेषता का उच्‍च स्‍तरीय प्रकटन किया वे ख़ुदा के पैग़म्‍बर हैं। ख़ुदा से उनका प्रेम और संबंध इतना दृढ़ था कि उन्‍होंने प्रत्‍येक परिस्थिति में उसके आदेशों को चाहे वे किसी भी प्रकार के हों दृष्टिगत रखा और उन्‍हें पूर्णरूप से लागू करने का प्रयास किया। यह बात उनके ख़ुदा के साथ की गई प्रतिज्ञा तथा उनकी उच्‍च कोटि की वफ़ादारी को प्रकट करती है। अत: उनकी वफ़ादारी के इस मापदण्‍ड को हमें आदर्श के तौर पर अपनाना चाहिए। अत: आगे बढ़ने से पूर्व यह समझना आवश्‍यक है कि वफ़ादारी का वास्‍तविक अर्थ क्‍या है ?

वफ़ादारी क्या है?

इस्‍लामी शिक्षाओं के अनुसार वफ़ादारी की परिभाषा तथा उसका वास्‍तविक अर्थ किसी का असंदिग्‍ध तौर पर हर स्‍तर पर और हर परिस्थिति में कठिनाइयों से दृष्टि हटाते हुए चाहे कैसी भी कठिनाईपूर्ण दशा का सामना करना पड़े अपनी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करना है। इस्‍लाम इसी वास्‍तविक वफ़ादारी की मांग करता है। पवित्र क़ुर्आन में विभिन्‍न स्‍थानों पर मुसलमानों को यह आदेश दिया गया है कि उन्‍हें अपनी प्रतिज्ञाओं और क़समों को अवश्‍य पूर्ण करना है, क्‍योंकि वे अपनी समस्‍त प्रतिज्ञाओं के प्रति जो उन्‍होंने की हैं ख़ुदा के समक्ष उत्तरदायी होंगे। मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया है कि वे ख़ुदा और उसकी सृष्टि से की गई समस्‍त प्रतिज्ञाओं को उनके महत्त्व और प्राथमिकताओं के अनुसार पूरा करें।
इस सन्‍दर्भ में एक प्रश्‍न जो कि लोगों के मस्तिष्‍क में पैदा हो सकता है वह यह है कि चूंकि मुसलमान यह दावा करते हैं कि ख़ुदा और उसका धर्म उनके निकट अत्‍यधिक महत्त्व रखते हैं जिस से यह प्रकट होता है कि ख़ुदा के लिए वफ़ादारी उनकी प्रथम प्राथमिकता है और ख़ुदा से उनकी प्रतिज्ञा सर्वाधिक महत्त्व रखती है। वे इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करने का प्रयत्‍न करते हैं। अत: यह आस्‍था सामने आ सकती है कि एक मुसलमान की अपने देश के लिए वफ़ादारी तथा उसका अपने देश के कानूनों को पालन करने की प्रतिज्ञा उसके निकट अधिक प्राथमिकता नहीं रखती। अत: इस प्रकार वह विशेष अवसरों पर अपने देश के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो जाएगा।

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का आदेश

इस प्रश्‍न का उत्तर देने के लिए मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि हज़रत मुहम्‍मद सल्लल्लाहो अलैैहि वसल्लम ने यह शिक्षा दी है कि अपने देश से प्रेम ईमान का भाग है। अत: शुद्ध देश-प्रेम इस्‍लाम की मांग है। ख़ुदा और इस्‍लाम से सच्‍चा प्रेम अपने देश से प्रेम की मांग करता है। अत: यह बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है कि इस स्थिति में एक व्‍यक्ति के ख़ुदा से प्रेम तथा अपने देश से प्रेम के संबंध में उसके हितों का कोई टकराव नहीं हो सकता जैसा कि अपने देश से प्रेम करने को ईमान का एक भाग बना दिया गया है। अत: यह बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट है कि एक मुसलमान अपने संबंधित देश के लिए वफ़ादारी करने में सबसे उच्‍च स्‍तर पर पहुंचने का प्रयत्‍न करेगा, क्‍योंकि ख़ुदा तक पहुंचने और उसका सानिध्‍य प्राप्‍त करने का यह भी एक माध्‍यम है। अत: यह असंभव है कि ख़ुदा का वह प्रेम जो एक मुसलमान अपने अन्‍दर रखता है वह उसके लिए अपने देश से प्रेम और वफ़ादारी को प्रकट करने में एक रोक बन जाए।

सरकार द्वारा उत्पीड़न

दुर्भाग्‍यवश हम यह देखते हैं कि कुछ विशेष देशों में धार्मिक अधिकारों को सीमित कर दिया जाता है या पूर्णतया हनन किया जाता है। अत: एक और प्रश्‍न उठता है कि क्‍या वे लोग जिनको स्‍वयं उनकी सरकार तंग करती है या अत्‍याचार करती है वे इस स्थिति में भी अपने देश के लिए वफ़ादारी और प्रेम का संबंध यथावत् रख सकते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में इस्‍लाम इस बात का समर्थक है कि जहां अत्याचार अपनी समस्‍त सीमाओं को पार कर जाए और असहनीय हो जाए तब ऐसे समय में एक व्‍यक्ति को उस शहर या देश से किसी अन्‍य स्‍थान पर प्रवास कर जाना चाहिए जहां वह अमन के साथ स्‍वतंत्रतापूर्वक अपने धर्म का पालन कर सके। बहरहाल इस मार्ग-दर्शन के साथ-साथ इस्‍लाम यह भी शिक्षा देता है कि किसी भी स्थिति में किसी व्‍यक्ति को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए और न ही अपने देश के विरुद्ध किसी भी योजना या षडयंत्र में भाग लेना चाहिए। यह एक बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट और असंदिग्‍ध आदेश है जो इस्‍लाम ने दिया है।

विद्रोह से परहेज़

वफ़ादारी के संदर्भ में पवित्र क़ुर्आन ने एक और शिक्षा दी है वह यह है कि लोगों को उन समस्‍त बातों से दूर रहना चाहिए जो अशिष्‍ट, अप्रिय और किसी भी प्रकार के विद्रोह की शिक्षा देती हों। यह इस्लाम की वह अभूतपूर्व सुन्‍दर और विशेष शिक्षा है जो न केवल अन्तिम परिणाम की ओर हमारा ध्‍यान आकृष्‍ट करती है जहां ये परिणाम बहुत ख़तरनाक होते हैं अपितु यह हमें उन छोटे-छोटे मामलों से भी अवगत कराती है जो मनुष्‍य को खतरों से भरे मार्ग पर अग्रसर करने के लिए सीढि़यों का कार्य करते हैं। अत: यदि इस्‍लामी पथ-प्रदर्शन को उचित रंग में अपनाया जाए तो किसी भी मामले को इससे पूर्व कि परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाएं प्रथम पग पर ही सुलझाया जा सकता है।

धन-सम्पत्ति की लालसा

उदाहरणतया एक मामला जो एक देश को बहुत अधिक हानि पहुंचा सकता है वह लोगों का धन-सम्‍पत्ति का लोभ है। अधिकांश लोग इन भौतिक इच्‍छाओं में मुग्‍ध हो जाते हैं जो नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं और ऐसी इच्‍छाएं अन्‍तत: लोगों को बेवफ़ाई की ओर ले जाती हैं। इस प्रकार से ऐसी इच्छाएं अन्‍तत: अपने देश के विरुद्ध किसी के देशद्रोह का कारण बनती हैं।
अरबी भाषा में एक शब्‍द ‘बग़ा’ उन लोगों या उन कार्यों को वर्णन करने के लिए प्रयोग होता है जो अपने देश को हानि पहुंचाते हैं, जो ग़लत कार्यों में भाग लेते हैं या दूसरों को हानि पहुंचाते हैं। इसमें वे लोग भी सम्मिलित हैं जो धोखा करते हैं और इस प्रकार से विभिन्‍न वस्‍तुओं को अवैध ढंगों से प्राप्‍त करने का प्रयत्‍न करते हैं। यह उन लोगों पर भी चरितार्थ होता है जो समस्‍त सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं और हानि पहुंचाते हैं। इस्‍लाम यह शिक्षा देता है कि जो लोग इस प्रकार के कार्य करते हैं उनसे वफ़ादारी की आशा नहीं की जा सकती, क्‍योंकि वफ़ादारी उच्‍च नैतिक मूल्‍यों से सम्बद्ध है और उच्‍च नैतिक मूल्‍यों के अभाव में वफ़ादारी का अस्तित्व नहीं रह सकता। यह भी वास्‍तविकता है कि विभिन्‍न लोगों के उच्‍च नैतिक मापदण्‍ड के संबंध में भिन्‍न-भिन्‍न विचारधाराएं हो सकती हैं फिर भी इस्लाम चारों ओर से ख़ुदा की प्रसन्नता पाने के लिए प्रेरित करता है और मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया है कि वे ऐसा कार्य करें कि जिस से ख़ुदा प्रसन्‍न हो। संक्षिप्‍त तौर पर यह कि इस्‍लामी शिक्षा के अनुसार ख़ुदा ने हर प्रकार के विद्रोह या ग़द्दारी को निषिद्ध ठहरा दिया है चाहे वह अपने देश या सरकार के विरुद्ध हो। क्योंकि विद्रोह या सरकार के विरुद्ध कार्य, देश की सुरक्षा और शान्ति के लिए एक ख़तरा है। यह वास्‍तविकता है कि जहां आन्‍तरिक विद्रोह अथवा शत्रुता प्रकट होती है तो यह बाह्य विरोध की अग्नि को भी हवा देती है तथा बाहरी संसार को प्रोत्‍साहित करती है कि वह आन्‍तरिक विद्रोह से लाभ प्राप्‍त करे। इस प्रकार अपने देश से बेवफ़ाई के परिणाम दूरगामी और ख़तरनाक हो सकते हैं। अतः जो भी बात किसी देश को हानि पहुंचाए वह बग़ा की परिभाषा में सम्मिलित है। इन समस्‍त बातों को ध्यान में रखते हुए अपने देश के प्रति वफ़ादारी, एक व्‍यक्ति से यह मांग करती है कि वह धैर्य का प्रदर्शन करे और अपने सदाचार दिखाते हुए राष्‍ट्रीय कानूनों का सम्‍मान करे।

राष्ट्रीय प्रगति

सामान्यतया कहने को तो वर्तमान युग में अधिकतर सरकारें प्रजातंत्रीय प्रणाली पर चलती हैं। इसलिए यदि कोई व्‍यक्ति या गिरोह सरकार को परिवर्तित करने की इच्‍छा करता है तो वह उचित प्रजातंत्रीय पद्धति को अपनाते हुए ऐसा कर सकता है। मत-पेटियों में अपना वोट डालकर उन्‍हें अपनी बात पहुंचानी चाहिए। व्‍यक्तिगत प्राथमिकताओं या व्‍यक्तिगत हितों के आधार पर वोट नहीं डालने चाहिएं, परन्‍तु वास्‍तव में इस्‍लाम यह शिक्षा देता है कि किसी भी व्‍यक्ति के वोट का प्रयोग अपने देश से वफ़ादारी और प्रेम की समझ के साथ होना चाहिए तथा किसी भी व्‍यक्ति के वोट का प्रयोग देश की भलाई को दृष्टिगत रखते हुए होना चाहिए। अत: किसी भी व्‍यक्ति को अपनी व्‍यक्तिगत प्राथमिकताओं को नहीं देखना चाहिए और यह भी नहीं देखना चाहिए कि किस प्रत्‍याशी या पार्टी से वह व्‍यक्तिगत लाभ प्राप्‍त कर सकता है अपितु एक व्‍यक्ति को संतुलित ढंग से यह निर्णय करना चाहिए और जिसका वह अनुमान भी लगा सकता है कि कौन सा प्रत्‍याशी या पार्टी पूरे देश की उन्‍नति में सहायता देगी। सरकार की कुंजियां एक बड़ी अमानत होती हैं जिसे उस पार्टी के सुपुर्द किया जाना चाहिए जिसके बारे में वोटर ईमानदारी से यह विश्‍वास करें कि वह सब से अधिक उचित और सब से अधिक योग्‍य है। यह सच्चा इस्‍लाम है और यही सच्‍ची वफ़ादारी है।
वास्‍तव में पवित्र क़ुर्आन की सूरः अन्निसा की आयत संख्या 59 में ख़ुदा ने यह आदेश दिया है कि अमानत केवल उस व्‍यक्ति के सुपुर्द करनी चाहिए जो उस का पात्र हो और लोगों के मध्‍य निर्णय करते समय उसे न्‍याय और ईमानदारी से निर्णय करने चाहिएं। अतः अपने देश के प्रति वफ़ादारी यह मांग करती है कि सरकार की शक्ति उन्‍हें दी जानी चाहिए जो वास्‍तव में उसके पात्र हों ताकि उनका देश उन्‍नति कर सके और विश्‍व के अन्य देशों की तुलना में सबसे आगे हो।

हड़तालें और प्रदर्शन

विश्‍व के बहुत से देशों में हम देखते हैं कि प्रजा सरकार की नीतियों के विरुद्ध हड़तालों और प्रदर्शनों में भाग लेती है। इससे भी बढ़कर तीसरी दु‌िनया के देशों में प्रदर्शनकारी तोड़-फोड़ करते हैं या उन सम्‍पत्तियों और जायदादों को हानि पहुंचाते हैं जो या तो सरकार से संबंध रखती हैं या सामान्‍य नागरिकों की होती हैं। यद्यपि उनका यह दावा होता है कि उनकी यह प्रतिक्रिया देश प्रेम से प्रेरित है, परन्‍तु वास्‍तविकता यह है कि ऐसे कार्यों का वफ़ादारी या देश-प्रेम के साथ दूर का भी संबंध नहीं। यह स्‍मरण रखना चाहिए कि जहां प्रदर्शन और हड़तालें शान्तिपूर्ण ढंग से भी की जाती हैं या अपराध, हानि एवं कठोरता के बिना की जाती हैं फिर भी उनका एक नकारात्‍मक प्रभाव हो सकता है। इसका कारण यह है कि शान्तिपूर्ण प्रदर्शन भी प्राय: देश की आर्थिक स्थिति की करोड़ों की हानि का कारण बनते हैं। ऐसे कृत्‍यों को किसी भी दशा में देश से वफ़ादारी का उदाहरण नहीं ठहराया जा सकता। एक सुनहरा सिद्धान्‍त जिसकी जमाअत अहमदिया के प्रवर्तक ने शिक्षा दी थी वह यह था कि हमें समस्‍त परिस्थितियों में ख़ुदा, उसके अवतारों तथा अपने देश के शासकों के प्रति वफादार रहना चाहिए। य‌ही शिक्षा पवित्र क़ुर्आन में दी गई है। अतः उस देश में भी जहां हड़ताल और रोष-प्रदर्शन करने की अनुमति है, वहां इनका संचालन उसी सीमा तक होना चाहिए जिससे देश अथवा देश की आर्थिक स्थिति को कोई हानि न पहुंचे।
अतः इस्लामी शिक्षाओं के ये कुछ दृष्टिकोण हैं जो देशप्रेम और देशभक्ति की वास्तविक मांगों के सम्बन्‍ध में मुसलमानों का मार्गदर्शन करते हैं।

देशों के मुखिया

अन्त में हम यह कहना चाहते हैं कि आज समूचा विश्व एक वैश्विक ग्राम बन चुका है। मनुष्‍य एक दूसरे के बहुत निकट आ गए हैं। समस्‍त देशों में प्रत्‍येक जाति, धर्म और सभ्‍यताओं के लोग पाए जाते हैं। यह स्थिति मांग करती है कि प्रत्‍येक देश के राजनीतिज्ञ उनकी भावनाओं और अहसासों को दृष्टिगत रखें और उनका सम्‍मान करें। शासकों और उनकी सरकारों को ऐसे कानून बनाने का प्रयास करना चाहिए जो सत्‍य की भावना तथा न्‍याय के वातावरण को बढ़ावा देने वाले हों। ऐसे कानून न बनाएं जो कि लोगों को निरुत्‍साहित करने और अशान्ति फैलाने का कारण बनें। अन्‍याय और अत्‍याचार समाप्‍त करके हमें वास्‍तविक न्‍याय के लिए प्रयास करने चाहिएं।

लोग अपने स्रष्टा को पहचानें

इसका सर्वोत्तम उपाय यह है कि संसार को अपने स्रष्‍टा को पहचानना चाहिए। प्रत्‍येक प्रकार की वफ़ादारी का संबंध ख़ुदा से वफ़ादारी होना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो हम अपनी आंखों से देखेंगे कि समस्‍त देशों के लोगों में एक सर्वोच्‍च स्‍तर वाली वफ़ादारी जन्‍म लेगी और सम्‍पूर्ण विश्‍व में नवीन मार्ग प्रशस्‍त होंगे जो हमें अमन और शान्ति की ओर ले जाएंगे।

उपरोक्त सभी उद्धरण विश्वव्यापी अहमदिया मुस्लिम जमाअत के अगुवा एवं प्रमुख हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहिब ख़लीफ़तुल मसीह पंचम के भाषण से उद्धृत किए गए हैं। सारा भाषण World Crisis and the Pathway to Peace (विश्व संकट तथा शान्तिपथ) नामक किताब के रूप में प्रकाशित हो चुका है। जिसमें आपके ब्रिटिश, यूरोपियन, न्यूज़ीलैंड इत्यादि की संसदों में ‌दिए गए भाषणों के अतिरिक्त Capitol Hill Washington DC USA में अमेरिकन कांग्रेस में दिया गया भाषण भी सम्मिलित है। पूर्ण जानकारी हेतु यह किताब निम्नलिखित पते से प्राप्त की जा सकती है। ख़ुदा हम सब को सामर्थ्य दे कि हम अपने देश के वफ़ादार नागरिक बनें।

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1 टिप्पणी

Tahir Ahmad Dani · फ़रवरी 4, 2021 पर 10:57 पूर्वाह्न

Mashallah, Love India, proud to be an Indian citizen❤️

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