अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत के संस्थापक हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अलैहिस्सलाम और मानवता की सेवा

शाह हारुन सैफी

JUNE 15, 2021

शब्द “इन्सान” अरबी शब्द “उन्स” का द्विवचन है जिसका अर्थ है “दो मुहब्बतें”। अर्थात जब किसी व्यक्ति में दो मुहब्बतें एक अल्लाह की मुहब्बत और दूसरी उसकी सृष्टि की मुहब्बत इकट्ठी हो जाती है तब वह व्यक्ति वास्तव में इन्सान कहलाता है। इन्सान की उत्पत्ति का उद्देश्य मानवता की सेवा और उसका उद्धार है अपितु केवल अल्लाह की इबादत या भक्ति के लिए फ़रिश्ते ही काफी थे जैसा कि प्रसिद्ध कवि ख़्वाजा मीर दर्द लिखते हैं कि:-

दर्द-ए-दिल के वास्ते पैदा किया इन्सान को

वरना ताअत के लिए कुछ कम न थे कर्रो बयां       

और यही मानव जीवन का उद्देश्य है कि जहाँ वह अल्लाह की इबादत से उसे प्रसन्न करे वहीं मानवजाति की सेवा करके दोनों मुहब्बतों को प्राप्त करने का प्रयास करता रहे। मानव जीवन के इसी उद्देश्य के अनुस्मारक और स्थापना के लिए अल्लाह तआला प्रत्येक युग में अपने नबियों और अवतारों को प्रकट करता है। अतः हज़रत राम अलैहिस्सलाम, हज़रत कृष्ण अलैहिस्सलाम, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम, हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अर्थात समस्त नबी और अवतार इसी उद्देश्य की स्थापना के लिए प्रकट हुए हैं। इसी प्रकार वर्तमान काल में अल्लाह तआला ने इस उद्देश्य के अनुस्मारक हेतु हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अलैहिस्सलाम को प्रकट किया। आप अलैहिस्सलाम का समस्त जीवन मानवजाति की सेवा और उसके कल्याण के लिए समर्पित था और आपने अपने पवित्र जीवन का एक एक पल मानवजाति की सेवा में व्यतीत किया। अतः आप अपने जीवन उद्देश्य का वर्णन करते हुए फरमाते हैं:-

मेरा मतलूब व मक़सूद व तमन्ना खिदमत-ए-ख़ल्क़ अस्त

हमी कारम हमी बारम हमी रसमम हमी राहम

अर्थात मेरे जीवन का अर्थ और उद्देश्य और इच्छा मानवता की सेवा है यही मेरा कार्य है यही मेरा कर्तव्य और ज़िम्मेदारी है यही मेरा मार्ग है।

 हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अलैहिस्सलाम ने 1889 ईस्वी में अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत की स्थापना की। इस पवित्र जमाअत में उपस्थित होने के लिए आपने अपने अनुयायियों के लिए 10 शर्तों का गठन किया जो दस शरायत-ए-बैअत के नाम से प्रसिद्ध हैं। अतः उनमे चौथी शर्त आपने यह रखी कि:-

“सामान्य रूप से सम्पूर्ण मानव-समाज और विशेषकर मुसलमानों को अपने तामसिक आवेगों के समय किसी प्रकार का अनुचित कष्ट नहीं पहुँचाएगा, न वाणी से, न हाथ से, न किसी अन्य प्रकार से’’।

(इश्तिहार तक्मील-ए-तब्लीग़ 12 जनवरी सन् 1889 ई.)

इसी प्रकार नवी शर्त का वर्णन करते हुए फ़रमाते हैं कि:-

“प्रभु की समस्त सृष्टि के प्रति सहानुभूति में केवल मात्र अल्लाह तआला के लिए लगा रहेगा और यथासम्भव अपनी ईश्वर प्रदत शक्तियों और वरदानों से मानव समाज को लाभ पहुँचाएगा”।

(इश्तिहार तक्मील-ए-तब्लीग़ 12 जनवरी सन् 1889 ई.)

इसी प्रकार हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि:-

“हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखो कि कितनी अधिक सेवाओं में जीवन व्यतीत किया और हज़रत अली र.अ. की हालत को देखो कि इतने पैवन्द लगाए कि जगह न रही। हज़रत अबु बक़र र.अ ने एक बुढ़िया को सदैव हलवा खिलाना अपना स्वभाव बना रखा था। ग़ौर करो कि यह कितना अधिक प्रबन्ध था। जब आपकी मृत्यु हुई तो उस बुढ़िया ने कहा कि आज अबु बकर कि मृत्यु हो गई उसके पड़ोसियों ने कहा कि क्या तुझको इल्हाम हुआ या वह्यी (देव वाणी) हुई? तो उसने कहा कि नहीं आज हलवा लेकर नहीं आया इसलिए ज्ञात हुआ कि मृत्यु हो गई। अर्थात जीवन में सम्भव न था कि किसी स्थिति में भी हलवा न पहुँचे। देखो कितनी अधिक सेवा थी। ऐसा ही सबको चाहिए कि मानवता की सेवा करे।  (मलफ़ूज़ात जिल्द 3 पृष्ठ 369-370)

हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियानी अलैहिस्सलाम सदैव मानवता की सेवा में लीन रहते थे और कोई अवसर मानवता की सेवा का हाथ से न जाने देते थे आपकी पवित्र जीवनी ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है। उनमे से कुछ उदाहरण प्रिय पाठकों की सेवा में उपस्थित हैं।

गांव देहात की औरतें एक दिन बच्चों के लिए दवाई इत्यादि लेने आईं। हुज़ूर उनको देखने और दवाई देने में व्यस्त रहे। इस पर मौलवी अब्दुल करीम साहब ने कहा कि हुज़ूर यह तो बड़ा कष्टमय कार्य है और इस प्रकार हुज़ूर का बहुमूल्य समय व्यर्थ हो जाता है। इसके उत्तर में हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया:-

“यह भी तो वैसा ही धार्मिक कार्य है। यह ग़रीब लोग हैं यहाँ कोई अस्पताल नहीं। मैं इन लोगो के कारण हर प्रकार की अंग्रेज़ी और यूनानी दवाएँ मँगवा रखता हूँ जो समय पर काम आ जाती हैं। यह बड़े पुण्य का कार्य है। मोमिन को इन कार्यों में आलसी और लापरवाह नहीं होना चाहिए’’।   

(मलफ़ूज़ात जिल्द 1 पृष्ठ 308)

हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद अलैहिस्सलाम के ह्रदय में मानवता की सेवा का जो सागर ठाठे मारता था उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आप अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि:-

“मेरी तो यह स्थिति है कि यदि किसी को दुःख होता हो और मैं नमाज़ में व्यस्त हूँ। मेरे कान में उसकी आवाज़ पहुँच जाए तो मैं यह चाहता हूँ कि नमाज़ तोड़ कर भी यदि उसको लाभ पहुँचा सकता हूँ तो लाभ पहुँचाऊ और जहाँ तक सम्भव है उस से सहानुभूति करुँ। यह नैतिकता के विरुद्ध है कि किसी भाई के दुःख और तकलीफ़ में उसका साथ न दिया जाए। यदि तुम उसके लिए कुछ भी नहीं कर सकते तो कम से कम दुआ ही करो। अपने तो एक तरफ मैं तो कहता हूँ कि गैरों और हिन्दुओं के साथ भी ऐसी नैतिकता का उदाहरण दिखाओ और उनसे सहानुभूति करो। क्रोधित स्वभाव नहीं होना चाहिए”।  

(मलफ़ूज़ात जिल्द 4 पृष्ठ 82 -83)

बिना भेदभाव धर्म, जाति या रंग व नस्ल समस्त मानवजाति की सेवा करने के सम्बन्ध में हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद अलैहिस्सलाम अपने अनुयायिओं को सम्बोधित करते हुए फ़रमाते हैं:-

“अतः तुम जो मेरे साथ सम्बन्ध रखते हो याद रखो कि तुम हर व्यक्ति से चाहे वह किसी धर्म का हो सहानुभूति करो और बिना भेदभाव हर एक से नेकी करो क्योकि यही पवित्र क़ुरआन की शिक्षा है”।

(मलफ़ूज़ात जिल्द 4 पृष्ठ 219)

आपके एक अनुयायी मुफ़्ती मोहम्मद सादिक़ साहिब वर्णन करते हैं कि हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलम फ़रमाते थे कि:-

“हमारे बड़े सिद्धान्त दो हैं पहला ख़ुदा के साथ सम्बन्ध साफ़ रखना दूसरे उसके बन्दों के साथ सदभाव और नैतिकता का व्यवहार करना”।

(ज़िक्र-ए-हबीब पृष्ठ -180)

इसी प्रकार आप अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं:-

“हमारा यह सिद्धांत है कि सभी मानव जाति से सहानुभूति करो। अगर एक व्यक्ति किसी पड़ोसी हिन्दू को देखता है कि उसके घर मे आग लग गई और यह नही उठता कि आग बुझाने में मदद दे तो मैं सच सच कहता हूँ कि वह मुझसे नही है। अगर एक व्यक्ति हमारे अनुयायियों में से देखता है कि एक ईसाई की कोई हत्या करता है और वह उसे छुड़ाने के लिए मदद नहीं करता तो मैं तुम्हे सही कहता हूँ कि वह हम में से नही है।” (सिराज-ए-मुनीर पृष्ठ 28)

वर्तमान काल में अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत और मानवजाति की सेवा

वर्तमान काल में अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत, हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद अलैहिस्सलाम की पवित्र शिक्षानुसार और आपके पाँचवे ख़लीफ़ा हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़ के नेतृत्व में निरन्तर मानवजाति की सेवा और कल्याण में व्यस्त है।

अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत आज समस्त विश्व में सैंकड़ो स्कूलों, यूनिवर्सिटीज, अस्पतालों, लंगर खानों इत्यादि के माध्यम से बिना किसी धर्म, जाति या रंग व नस्ल के समस्त मानवजाति की सेवा में प्रयासरत है। इसी प्रकार  विश्व के 200  से अधिक देशों में स्थापित अहमदिय्या मुस्लिम जमाअत की संस्था Humanity first प्राकृतिक आपदा और मानवजाति के प्रत्येक दुःख, तक़लीफ़ के समय सदैव प्रथम पंक्ति में नज़र आती है।

अल्लाह तआला से दुआ है कि अल्लाह हम सबको मानवजाति की सेवा करने की शक्ति प्रदान करे। आमीन।

हैं लोग वही जहाँ में अच्छे

आते हैं जो काम दूसरों के



लेखक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के मिशनरी हैं


1 टिप्पणी

Samiur Rahman · जून 15, 2021 पर 11:01 पूर्वाह्न

इस्लाम अहमदिया जिंदाबाद

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