दीन को दुनिया पर मुक़द्दम रखो: जलसा सालाना जर्मनी 2026 में महिलाओं को अहमदिया ख़लीफ़ा का संबोधन

प्रत्येक अहमदी पुरुष और महिला की यह ज़िम्मेदारी है कि वे अपने घरों से आरंभ कर शांति और सद्भाव की आधारशिला रखने का प्रयास करें।

जलसा सालाना जर्मनी 2026 के महिला सत्र में अहमदिया मुस्लिम जमाअत के विश्वव्यापी प्रमुख एवं पाँचवें ख़लीफ़ा हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाह) द्वारा दिए गए संबोधन का सारांश।

साभार: अल हकम

5 सितंबर 2026 को अहमदिया मुस्लिम जमाअत के विश्वव्यापी प्रमुख एवं पाँचवें ख़लीफ़ा हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद (अय्यदहुल्लाह) ने जलसा सालाना जर्मनी 2026 के दूसरे दिन लज्ना इमाईल्लाह (महिलाओं) के सत्र को संबोधित किया। हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने यूके के इस्लामाबाद से वर्चुअली जर्मनी में उपस्थित महिलाओं की सभा को ख़िताब फ़रमाया।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने अपने संबोधन के प्रारंभ में फ़रमाया कि यह अल्लाह तआला का जमाअत पर बहुत बड़ा एहसान है कि उसने अहमदी महिलाओं में इल्म (ज्ञान) हासिल करने के महत्व का अहसास पैदा किया, ताकि वे और उनकी आने वाली नस्लें ईश्वरीय अनुग्रह की पात्र बन सकें। ऐसे दौर में जब दुनिया भौतिक सुख-सुविधाओं और सांसारिक व्यस्तताओं में पूरी तरह खोती जा रही है, अहमदी महिलाओं को अपने इस अहद (प्रतिज्ञा) पर अडिग रहना चाहिए कि वे दीन को दुनिया पर प्राथमिकता देंगी।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने सचेत करते हुए फ़रमाया कि आज शैतान और दज्जाल के प्रलोभन और हमले हर ओर फैले हुए हैं, और पश्चिमी देशों में रहने वाली महिलाओं सहित कोई भी अहमदी इनसे अछूता नहीं है। कई बार उच्च शिक्षा और सांसारिक सफलता स्वयं एक फ़ित्ना या आज़माइश बन जाती हैं। इस्लाम महिलाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने या सफलता हासिल करने से कभी नहीं रोकता; बल्कि वह ज्ञान की खोज और तरक़्क़ी को प्रोत्साहित करता है। लेकिन इसके साथ ही, एक मोमिन को हमेशा उन ज़िम्मेदारियों और दायित्वों के प्रति सजग रहना चाहिए जो धर्म ने उस पर निर्धारित किए हैं।

हज़रत आइशा (रज़ि.) और प्रारंभिक इस्लाम की अन्य प्रतिष्ठित मुस्लिम महिलाओं का उदाहरण देते हुए हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने स्पष्ट किया कि उन्होंने उच्च आध्यात्मिक दर्जे के साथ-साथ गहरा धार्मिक ज्ञान भी अर्जित किया था। उनका योगदान केवल नमाज़ और इबादत तक सीमित नहीं था; बल्कि उनकी रिवायतों (कथनों) और ज्ञान से आज भी मुस्लिम न्यायविद् धार्मिक मामलों को समझने में मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही, वे अपनी ज़िम्मेदारियों को समझती थीं और उन्हें निभाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत रहती थीं। वे केवल अपने अधिकार माँगने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों को अदा करने के प्रति भी उतनी ही सचेत थीं। यही कारण है कि इस्लामी इतिहास में उन्हें अत्यंत आदर के साथ याद किया जाता है।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि आज अहमदी महिलाओं को इन आदर्शों को अपने सामने रखना चाहिए और अपने घरों, अपने बच्चों और अपने परिवारों के नैतिक व आध्यात्मिक सुधार के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों पर विचार करना चाहिए। यदि उन्हें लगता है कि आज कुछ पुरुष अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, तो महिलाओं को ऐसी भावी पीढ़ी तैयार करने का प्रयास करना चाहिए जो अपने कर्तव्यों को ठीक से समझे और उनका निर्वहन करे।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने कहा कि इस लक्ष्य को पाने के लिए यह ज़रूरी है कि अहमदी बार-बार इस बात का अध्ययन करें और अपने सामने रखें कि हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) ने अपनी पैरवी करने वालों से क्या अपेक्षाएँ रखी थीं। उनकी शिक्षाओं पर अमल किए बिना अहमदी होने का मक़सद पूरा नहीं हो सकता।

हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) के पावन वचनों का उल्लेख करते हुए हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) फ़रमाया करते थे कि यदि इंसान के आमाल (कर्म) नेक नहीं हैं, तो सिर्फ़ उनसे जुड़ जाने का कोई लाभ नहीं। अल्लाह तआला के ज़िक्र और उसकी इबादत के साथ-साथ, बंदों के हक़ूक़ (मानवाधिकार) अदा करना भी अनिवार्य है। उच्च नैतिक आचरण का मतलब केवल उन्हीं के साथ भलाई करना नहीं है जो हमारे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं; बल्कि अगर कोई हमारे साथ बुराई भी करे, तो हमें उसे माफ़ करने और उसके साथ एहसान का सुलूक करने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब तक यह जज़्बा पैदा नहीं होता, इंसान उस वास्तविक अवस्था को नहीं पा सकता जिसके लिए इस जमाअत की स्थापना की गई थी।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अहमदी पुरुषों और महिलाओं दोनों को अपने घरों से शुरुआत करते हुए अमन और सुलह-सफ़ाई की नींव रखनी चाहिए। हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) के हवाले से बताया कि आपके आने के दो बुनियादी मक़सद थे: पहला, तौहीद (ईश्वर की एकता) की स्थापना और इबादत के ज़रिए अल्लाह के हक़ूक़ अदा करना; और दूसरा, इंसानों के बीच आपसी प्यार, करुणा और हमदर्दी पैदा करना ताकि मोमिन दूसरों के लिए बेहतरीन मिसाल बन सकें।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने समझाया कि सहाबा (रज़ि.) के जीवन में आया क्रांतिकारी बदलाव इन्हीं बुनियादी उसूलों पर टिका था। इंसान को दूसरों के लिए भी वही भलाई पसंद करनी चाहिए जो वह अपने लिए चाहता है। हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) की इस तालीम का भी ज़िक्र किया कि इमाम महदी के आगमन के लक्षणों में से एक यह भी था कि लोगों के दिलों से बुग़्ज़ और कीना (द्वेष और नफ़रत) मिटा दिया जाएगा। इसलिए जिन्होंने महदी को मान लिया है, उन्हें अपने भीतर से ऐसी नकारात्मक भावनाओं को पूरी तरह निकालने का प्रयास करना चाहिए। यही वे ख़ूबियाँ हैं जो इंसान को सच्चा अहमदी बनाती हैं।

इसके बाद हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि दुनिया कभी भी किसी मोमिन के वजूद का असल मक़सद नहीं होनी चाहिए; बल्कि सांसारिक साधन हमेशा दीन के उच्च उद्देश्य के अधीन रहने चाहिए। पश्चिमी देशों में बसे लोगों को संबोधित करते हुए आपने रेखांकित किया कि उनमें से बहुत से लोगों को पाकिस्तान की तुलना में यहाँ बेहतर हालात और बड़े अवसर मिले हैं। हालाँकि, उनमें से अधिकांश ने शुरू में इसलिए हिजरत (प्रवास) की थी क्योंकि वे वहाँ अपने धर्म का खुलकर पालन नहीं कर पा रहे थे। यदि बेहतर आर्थिक और भौतिक हालात में पहुँचने के बाद वे धन-दौलत और दुनियावी आराम की ख़ातिर दीन को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे उस प्राथमिकता को ही खो बैठेंगे जो उनके जीवन का मुख्य ध्येय होनी चाहिए थी।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) की उस चेतावनी की याद दिलाई जिसमें आपने फ़रमाया था कि न तो धन-दौलत का मोह और न ही औलाद का प्यार इंसान और अल्लाह तआला के बीच पर्दा (रुकावट) बनना चाहिए।

धार्मिक शिक्षा की चर्चा करते हुए हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि दीन की समझ हासिल करने और अल्लाह के अहकामात (आदेशों) पर अमल करने के लिए पवित्र क़ुरआन का अध्ययन अनिवार्य है। यह मुतालआ (अध्ययन) इंसान की अपनी नैतिक स्थिति को तो बेहतर बनाता ही है, साथ ही उसे इस्लाम के प्रचार-प्रसार (तब्लीग़) में भाग लेने के योग्य भी बनाता है। महिलाओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पुरुषों की है। ख़ास तौर पर दुनिया के मौजूदा हालात में अहमदी महिलाओं को आगे आना चाहिए और यह पैग़ाम पहुँचाने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए कि सच्ची मुक्ति और नजात केवल अल्लाह की ओर लौटने में ही है।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने स्पष्ट किया कि केवल बैअत कर लेना ही काफ़ी नहीं है। हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) की शिक्षाओं का हवाला देते हुए आपने फ़रमाया कि ज़ाहिरी अहद केवल छिलके की मानिंद है, जबकि उसका असल मग्ज़ (सार) निष्ठावान आचरण और नेक आमाल में छुपा है। और यह पवित्र क़ुरआन को पढ़े, उस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र किए और उसे समझे बिना हासिल नहीं हो सकता।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने कहा कि यह ज़िम्मेदारी महिलाओं की भी उतनी ही है जितनी कि पुरुषों की। लज्ना इमाईल्लाह के पास महिलाओं की धार्मिक शिक्षा का अपना सुदृढ़ निज़ाम है, जिसके तहत पवित्र क़ुरआन के पाठ और अनुवाद की कक्षाएं नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं। सदस्यों को इन अवसरों का पूरा लाभ उठाना चाहिए; किंतु इसका मक़सद सिर्फ़ रस्मी तौर पर सीखना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह नीयत होनी चाहिए कि अल्लाह तआला के आदेशों का पालन किया जाए और जिन बातों से उसने रोका है, उनसे बचा जाए।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने आगे फ़रमाया कि पवित्र क़ुरआन ने पर्दे और हया (शालीनता) के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। वर्तमान युग में कभी-कभी इन आदेशों को अनदेखा कर दिया जाता है या कम महत्व दिया जाता है। अहमदी महिलाओं का यह कर्तव्य है कि वे इन शिक्षाओं को सही तरीक़े से समझें और उन पर पूरी निष्ठा से अमल करें।

इसके बाद हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद (स.) के पावन जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया, जिनका पूरा जीवन इस बात का गवाह था कि उनका सब कुछ केवल और केवल अल्लाह के लिए था। हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) ने भी बार-बार मुसलमानों को अपना दीन सीखने और दूसरों को सिखाने की ताकीद फ़रमाई। जब तक पुरुष और महिलाएँ अपने भीतर सच्चा और व्यावहारिक बदलाव नहीं लाते, वे सच्चे मन से यह दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने अपने धर्म के तक़ाज़ों को पूरा किया है।

हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने बुरी संगति से बचने और नमाज़ों में नियमित रहने की आवश्यकता पर बल दिया। वर्तमान युग में हानिकारक प्रभाव केवल भौतिक संगति तक सीमित नहीं हैं; टेलीविज़न, इंटरनेट और मीडिया के अन्य साधन भी लोगों को अनैतिकता के प्रभाव में ला सकते हैं। इन प्रभावों से ख़ुद को बचाने के लिए दुआओं के साथ-साथ अपने आचरण में भी उसी प्रकार के व्यावहारिक बदलाव की ज़रूरत है, जैसा रसूलुल्लाह (स.) के सहाबा के जीवन में दिखाई देता था। यदि एक मोमिन और दुनियादार के आचरण में कोई स्पष्ट अंतर नहीं दिखेगा, तो दूसरों के पास उनके आदर्श से प्रभावित होने का कोई कारण नहीं रह जाएगा।

हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) के निर्देशों का पुनः उल्लेख करते हुए हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि एक स्वस्थ रूहानी (आध्यात्मिक) अवस्था का ज़ाहिरी प्रमाण पंजवक्ता (पाँचों वक़्त की) नमाज़ों की पाबंदी है। जब महिलाएँ स्वयं नमाज़ों पर पूरा ध्यान देंगी और अपने बच्चों तथा पतियों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगी, तो घर के भीतर एक ऐसा पवित्र वातावरण तैयार होगा जो अल्लाह तआला के प्यार को अपनी ओर आकर्षित करेगा। हालाँकि, ये नमाज़ें केवल औपचारिकता के तौर पर नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक रूह के साथ अदा की जानी चाहिए।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि जब अहमदी पुरुष और महिलाएँ अपने भीतर ये गुण पैदा करेंगे, तभी वे भौतिक रूप से उन्नत समाजों में रहते हुए भी अपनी विशिष्ट पहचान क़ायम रख सकते हैं। केवल तभी वे सच्चाई के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने हज़रत मसीह-ए-मौऊद (अ.) की बैअत का हक़ अदा किया है, अपने और अपनी संतानों के भीतर सच्चे मुसलमान की पहचान विकसित की है, और पूरी दुनिया में नबी-ए-करीम (स.) का परचम बुलंद करने में अपनी भूमिका निभाई है।

संबोधन के समापन पर हुज़ूर (अय्यदहुल्लाह) ने फ़रमाया कि यदि अहमदी केवल दुनियादारों की नक़ल करेंगे, सिर्फ़ अपने अधिकारों की मांग तक सीमित रहेंगे और दुनिया को ही अपना अंतिम मक़सद बना लेंगे, तो अल्लाह तआला की नज़र में उनके अहमदी होने के दावे का कोई वज़न नहीं रह जाएगा।

हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने दुआ की कि अल्लाह तआला सभी महिलाओं और पुरुषों को अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने और उस मक़सद को पूरा करने की तौफ़ीक़ दे जिसके लिए वे जलसा सालाना में एकत्रित हुए थे।

इसके उपरांत हुज़ूर-ए-अनवर (अय्यदहुल्लाह) ने ख़ामोश दुआ के साथ इस मुबारक सत्र का समापन फ़रमाया।

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