पवित्र रमज़ान: आत्मशुद्धि, संयम और ईश-निकटता का महीना

रमज़ान के बाद भी हमारी नमाज़ में सुधार बना रहे, हमारे चरित्र में नर्मी आए, हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे व्यवहार में करुणा हो तो समझिए रमज़ान सफल हुआ।

पवित्र रमज़ान: आत्मशुद्धि, संयम और ईश-निकटता का महीना

रमज़ान के बाद भी हमारी नमाज़ में सुधार बना रहे, हमारे चरित्र में नर्मी आए, हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे व्यवहार में करुणा हो तो समझिए रमज़ान सफल हुआ।

अनसार अली ख़ान, ढेंकानाल

इस्लामी वर्ष का सबसे पवित्र और आध्यात्मिक रूप से उन्नत महीना – रमज़ान – एक बार फिर अपनी रहमतों, बरकतों और अनगिनत आध्यात्मिक अवसरों के साथ हमारे द्वार पर उपस्थित है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की एक जीती जागती कार्यशाला है।

पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है – “रमज़ान का महीना वह है जिसमें मानवजाति के लिए क़ुरआन को महान हिदायत के रूप में उतारा गया, जिसमें स्पष्ट प्रमाण और सत्य-असत्य में अंतर करने वाली शिक्षाएँ हैं। अतः जो इस महीने को पाए, वह इसके रोज़े रखे…”[1]

यह आयत रमज़ान की असल पहचान को स्पष्ट करती है — यह महीना पवित्र क़ुरआन का महीना है, हिदायत का महीना है, और इंसान के आंतरिक परिवर्तन का महीना है।

दोस्तो ! रमज़ान और पवित्र क़ुरआन का विशेष संबंध है। यद्यपि क़ुरआन करीम का अवतरण (23 वर्ष के) विभिन्न समयों में हुआ, परंतु रमज़ान की यह विशेषता है कि इस महीने में हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम, पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब के साथ मिलकर अवतरित क़ुरआन का पुनरावर्तन (दौर) किया करते थे। अंतिम वर्ष में यह दौर दो बार हुआ — जो इस महीने की असाधारण आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाता है।

रोज़ा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करने का माध्यम है।

अंतर्राष्ट्रीय अहमदिया मुस्लिम समुदाय के द्वितीय ख़लीफ़ा, हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद साहब ने रोज़े के उद्देश्य को अत्यंत सुंदर शब्दों में स्पष्ट किया है , उन्होंने कहा कि:

“रोज़ों का उद्देश्य किसी को भूखा या प्यासा मारना नहीं है… असल मुश्किल चारित्रिक और आध्यात्मिक परिवर्तन है।”

रोज़ा इंसान को यह सिखाता है कि वह अल्लाह को राज़ी करने के लिए अपने वैध अधिकारों तक को त्यागने के लिए तैयार रहे। जब इंसान भोजन, पानी और दाम्पत्य संबंध जैसे प्राकृतिक अधिकारों से स्वयं को रोक सकता है, तो वह गुनाह, क्रोध, लालच, चोरी, व्यभिचार जैसी बुराइयों से क्यों नहीं रुक सकता?

प्रिय पाठको ! रोज़ा – नैतिक प्रशिक्षण का विद्यालय है, रोज़ा इंसान के भीतर: संयम, सहनशीलता, करुणा, आत्मनियंत्रण, ईश-भक्ति जैसे गुणों का विकास करता है।

यह भूख का अनुभव कराकर ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता को जगाता है।

क़ुरआन करीम यह भी बताता है कि “हे ईमान वालो! तुम पर रोज़ा उसी प्रकार अनिवार्य किया गया है जैसे तुमसे पहले लोगों पर किया गया था…”[2]

यह स्पष्ट करता है कि उपवास केवल इस्लाम तक सीमित नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक अभ्यास रहा है। विभिन्न धर्मों में इसके स्वरूप अलग हो सकते हैं, परंतु उद्देश्य समान है — आत्मसंयम और आत्मशुद्धि।

ज्ञात हो कि रोज़े प्रत्येक व्यस्क, बुद्धिमान, स्वस्थ मुसलमान स्त्री और पुरुष पर अनिवार्य हैं।

परंतु बीमार, मुसाफ़िर, अत्यधिक वृद्ध, गर्भवती महिला, स्तनपान कराने वाली माता के लिए नहीं, ऐसी स्थिति में इनके लिए फ़िद्या (जरूरतमंदों को भोजन) का प्रावधान है। और बीमार तथा मुसाफिर को स्वस्थ होने तथा सफर के समाप्त होने पर छूटे हुए रोज़े बाद में पूरे करने का प्रावधान है।

जानबूझकर खाने-पीने, दाम्पत्य संबंध बनाने, जानबूझकर उल्टी करने से रोज़ा टूट जाता है।

इसी तरह भूलकर खाने-पीने, धूल/धुआँ का प्रवेश, नक्सीर फूटने, मिस्वाक/ब्रश करने या खुशबू सूँघने से नहीं टूटता।

दोस्तो! रोज़ेदारों का महान दर्जा हदीस शरीफ़ में वर्णन हुआ है कि हज़रत मुहम्मद साहब ने बताया कि अल्लाह फरमाता है कि – “इंसान के सारे कार्य उसके अपने लिए हैं, लेकिन रोज़ा मेरे लिए (स्वयं ख़ुदा के लिए) है, और मैं स्वयं उसका बदला हूँ।”[3]

 एक अन्य हदीस में लिखा है कि “जो ईमान और सवाब की नीयत से रोज़ा रखे, उसके पिछले सारे पाप क्षमा कर दिए जाते हैं।”[4]

रोज़े के लिए नीयत अनिवार्य है अर्थात यह कहे कि “मैं रमज़ान के कल के रोज़े की नीयत करता हूँ।” याद रखें — नीयत दिल का संकल्प है, शब्दों का उच्चारण आवश्यक नहीं।

रोज़ा खोलने की दुआ -: “अल्लाहुम्मा लका सुमतु व अला रिज़्केका अफ़्तरतु।”[5]

रमज़ान – एक आत्मिक क्रांति है, रमज़ान का उद्देश्य केवल एक महीने का संयम नहीं, बल्कि पूरे जीवन की दिशा बदल देना है।

यदि रमज़ान के बाद भी हमारी नमाज़ में सुधार बना रहे, हमारे चरित्र में नर्मी आए, हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे व्यवहार में करुणा हो तो समझिए रमज़ान सफल हुआ।

अल्लाह तआला हमें इस रमज़ान में सच्ची इबादत, आत्मसंयम, गुनाहों से तौबा और आध्यात्मिक उन्नति की शक्ति प्रदान करे। हमारा यह रमज़ान हमारी ज़िन्दगी में एक नई रोशनी, नई सोच और नई पवित्रता पैदा करने वाला बने। आमीन्।

लेखक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के प्रचारक हैं और अभी गोवा में सेवा कर रहे हैं

सन्दर्भ

[1] सूरह अल-बक़रह:186

[2] सूरह अल-बक़रह:184

[3] बुख़ारी शरीफ़

[4] इब्न माजह

[5] अबू दाऊद

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