ख़िलाफ़त

अल्लाह के नबी के उत्तराधिकारी

وَعَدَ اللَّهُ الَّذينَ آمَنوا مِنكُم وَعَمِلُوا الصّالِحاتِ لَيَستَخلِفَنَّهُم فِي الأَرضِ كَمَا استَخلَفَ الَّذينَ مِن قَبلِهِم وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُم دينَهُمُ الَّذِي ارتَضىٰ لَهُم وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِن بَعدِ خَوفِهِم أَمنًا ۚ يَعبُدونَني لا يُشرِكونَ بي شَيئًا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعدَ ذٰلِكَ فَأُولٰئِكَ هُمُ الفاسِقونَ (سورة النور، آیت ۵۶)

तुम में से जो लोग ईमान लाए और पुण्य कर्म किए उनसे अल्लाह ने पक्का वादा किया है कि उन्हें अवश्य धरती में ख़लीफ़ा बनाएगा जैसा कि उसने उन से पहले लोगों को ख़लीफ़ा बनाया। और उनके लिए उनके धर्म को जो उसने उनके लिए पसंद किया, अवश्य दृढ़ता प्रदान करेगा। और उनकी भयपूर्ण अवस्था के बाद उन्हें शांतिपूर्ण अवस्था में परिवर्तित कर देगा। वे मेरी उपासना करेंगे, मेरे साथ किसी को साझीदार नहीं ठहराएंगे। और जो उसके बाद भी कृतघ्नता करे तो यही वे लोग हैं जो अवज्ञाकारी हैं।

(सुरह : अन्न-नूर आयत :56)

Promised Messiah
हज़रत मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद,
मसीह मौऊद और महदी अलैहिस्सलाम
Hazrat Hakeem Nooruddin(ra)
हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन साहब
ख़लीफ़तुल मसीह प्रथम
Hazrat Mirza Bashiruddin Mahmud Ahmad(ra)
हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद साहब
ख़लीफ़तुल मसीह द्वितीय
Hazrat Mirza Nasir Ahmad(rh)
हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद साहब
ख़लीफ़तुल मसीह तृतीय
Hazrat Mirza Tahir Ahmad(rh)
हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहब
ख़लीफ़तुल मसीह चतुर्थ
Hazrat Mirza Masroor Ahmad(at)
हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद
अहमदिया मुस्लिम जमाअत के पांचवें खलीफा

ख़िलाफ़त-ए-अहमदिया

शब्द “ख़िलाफ़त” के अर्थ उत्तराधिकारी के हैं और ख़लीफ़ा अल्लाह के नबी का उत्तराधिकारी होता है जिस का कार्य नबी के द्वारा किए गए सुधार तथा नैतिक कार्यों को पूर्णता की ओर ले जाना होता है। नबी की अनुकरणीय जमाअत, जब तक अल्लाह चाहे, अपने ईमान और कर्मों की उन्नति में ख़िलाफ़त के प्रबंध अधीन चलती रहती है। अधिक पढ़ें

अहमदिया खिलाफत

हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन साहब

हज़रत मौलाना हकीम नूरुद्दीन साहब रज़ि॰ 1841 ई० में पंजाब के एक गाँव भेरा में पैदा हुए आप श्री हाफ़िज़ ग़ुलाम अहमद साहब के सबसे छोटे पुत्र थे। आप रज़ि॰ की वंशावली हज़रत उमररज़ि॰ से जा मिलती है जो इस्लाम के द्वितीय ख़लीफ़ा थे। आप एक महान व्यक्तित्व वाले थे। एक योग्य लेखक, प्रसिद्ध विद्वान, असमान्य रूप से नेक और धार्मिक ज्ञान में निपुण थे। चिकित्साशास्त्र में विशेषज्ञ होने के कारण आप कई वर्षों तक महाराजा जम्मू कश्मीर के शाही चिकित्सक रहे। आप को वास्तविक ज्ञान की तड़प थी जिसके कारण आप ने दूर-दूर की यात्राएं कीं और आपको मक्का और मदीना की पवित्र बस्ती में चार वर्ष तक निवास का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

23  मार्च 1889 ई० को जब हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम ने ख़ुदाई मार्गदर्शन के अनुसार बैअत लेना आरंभ किया तो आप को सबसे पहले बैअत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के पूर्ण रूप से आज्ञाकारी थे।

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की मृत्यु के बाद हज़रत हकीम मौलवी नूरुद्दीन साहबरज़ि॰ को पूर्ण सहमती से दिनांक 27 मई 1908 ई० को ख़लीफ़ा चयनित किया गया। आपरज़ि॰ ने अंतिम प्राणों 13 मार्च 1914 ई० तक जमाअत का मार्गदर्शन किया।

हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद साहब

हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने आने वाले मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम को एक आध्यात्मिक पवित्र और मौऊद(वादा किया गया) पुत्र की खुशख़बरी दी थी कि:

“वह मसीह मौऊद विवाह करेगा और उसके यहाँ सन्तान होगी और अल्लाह एक ऐसी सन्तान प्रदान करेगा जो उस के मिशन में सहायक सिद्ध होगी।”

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम को स्वयं भी ऐसे इल्हाम हुए जिन में एक महान पुत्र की भविष्यवाणी थी। आप पर यह प्रदर्शित किया गया था कि यह पुत्र इस्लाम की शिक्षा को दृढ़ता प्रदान करने और पुनः जीवित करने के उद्देश्य से आएगा और उसके द्वारा इस्लाम पुनः दुनिया में ज़ोर पकड़ेगा और जीवित होगा।

इस भविष्यवाणी के चरितार्थ वादा किए गए पुत्र हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद साहबरज़ि॰ 12 जनवरी 1889 ई० को क़दियान में पैदा हुए।

Hazrat Mirza Bashiruddin Mahmud Ahmad(ra)

आप ने बचपन में ही अपने रब के साथ एक दृढ़ संबंध स्थापित कर लिया था। अपनी छात्रावस्था में आपकी प्रचलित शिक्षा और पुस्तकों में रूचि नहीं थी इसलिए सरकारी नौकरी में जाने वाली परीक्षा में सफ़ल न हो सके। यह आपकी निरंतर शिक्षा का समापन था जो कि केवल संयोगवश न था अपितु बाद की घटनाओं ने यह सिद्ध किया कि यह ख़ुदाई इच्छा के अनुसार था और ख़ुदा स्वयं उसका अध्यापक बनना चाहता था। अतः दुनिया ने देखा कि आपरज़ि॰ को न केवल आध्यात्मिक और वास्तविक ज्ञान से जागरूकता थी अपितु आप ने बड़े-बड़े दुनिया के विद्वानों को अपने ज्ञान और दूरदर्शिता से जो इस्लाम पर एतराज़ करते थे उन्हें चुप करवाने वाले उत्तर दिए। अल्लाह तआला ने आपको आध्यात्मिक ज्ञान में सूक्षमता और पवित्र क़ुरआन का ज्ञान और समझ प्रदान की थी और इस प्रकार वह भविष्यवाणी पूरी हुई कि इसके द्वारा इस्लाम और पवित्र क़ुरआन की प्रतिष्ठा स्थापित होगी। आप ने अपने जीवन में पवित्र क़ुरआन की दस भागों पर आधारित व्याख्या लिखी। जो कि पवित्र क़ुरआन के वास्तविक अर्थों पर आधारित है।

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की मृत्यु के समय आप की आयु 19 वर्ष थी इस समय आप ने अपने हाथ से आलोचना करने वालों को चुप करवाने वाले उत्तर दिए। 26 मई 1908 ई० को जब हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की मृत्यु हुई तो आप अलैहिस्सलाम के इस मौऊद (वादा किए गए) पुत्र ने आप अलैहिस्सलाम की चारपाई के पास खड़े हो कर यह शब्द कहे कि :

“यद्यपि यह समस्त लोग आप को छोड़-छाड़ कर चले जाएं और मैं अकेला रह जाऊं मैं आप के साथ खड़ा रहूँगा और समस्त आक्रमणों और विरोध का सामना करूंगा।”

आपरज़ि॰ ने इस वचन को सुन्दरता पूर्वक निभाया और अपने संपूर्ण जीवन में आप ने शत्रुओं और विरोध की कोई परवाह नहीं की और सदैव इस्लाम और अहमदियत की उन्नति के लिए प्रयासरत रहे। हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह प्रथमरज़ि॰ की मृत्युपरांत मार्च 1914 ई० में आपरज़ि॰ को हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम का दूसरा उत्तराधिकारी चयनित किया गया।

आप के 52 वर्ष के ख़िलाफ़त के दौर में न केवल जमाअत ने बहुत कुछ प्राप्त किया अपितु आप ने देश का भी महत्वपूर्ण अवसरों पर मार्गदर्शन किया। साइमन कमीशन और गोल मेज़ कांफ्रेंस के अवसर पर आप ने अपने बहुमूल्य लेख और भाषण के माध्यम से मार्गदर्शन किया।

इसके अतिरिक्त आप ने शांति की स्थापना और धर्मों के मध्य सुलह और सहिष्णुता उत्पन्न करने हेतु स्थायी रूप से सर्व धर्म सम्मेलन के आयोजन की नींव रखी। जिन में विभिन्न धर्मों के वक्ताओं को आमंत्रित किया जाता है ताकि अपने धर्मों की शिक्षाओं और उनके अवतारों के बारे में बात कर सकें।

अपने पीछे ऐसी बहुमूल्य संपत्ति छोड़ कर आपरज़ि 8 नवंबर 1965 ई० को इस नश्वर संसार से चल बसे।

हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद साहब

हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद साहब रहेमहुल्लाह 16 नवंबर 1909 ई० को क़ादियान में पैदा हुए।

आप 1965 ई० में मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के तीसरे ख़लीफ़ा चयनित हुए। तब से आप ने मिशनरी गतिविधियों को ज़बरदस्त ऊँचाई दी। 1970 ई० में छः पश्चिमी अफ़्रीकी देशों की अपनी ऐतिहासिक यात्रा में ख़लीफ़तुल मसीह तृतीय ने घोषणा की:

Hazrat Mirza Nasir Ahmad(rh)

“समस्त मनुष्य समान हैं, एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति में कोई अंतर नहीं है। यदि दुनिया को इस बात की अनुभूति हो जाती है तो इस से बहुत सी परेशानियों में कमी आ जाएगी।”

“फ़ज़ल-ए-उमर फाउंडेशन”, “नुसरत जहाँ लेप फॉरवर्ड प्रोग्राम”, “जुबली फ़ण्ड” हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह तृतीय के द्वारा किए गए मुख्य कार्यों के कुछ उदाहरण हैं।

परन्तु पाकिस्तान की हुकूमत की ओर से ख़ुदा की दया की पात्र जमाअत को गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक ठहराए जाने पर आप की ओर से किया गया मर्गदर्शन आप का महत्वपूर्ण कार्य है। यह वास्तविकता है कि जमाअत अहमदिया को संगठन के रूप में पतन का सामना नहीं करना पड़ा इस बात को स्पष्ट करता है कि ख़लीफ़ा कोई कागज़ी शेर नहीं है और वह आज़माइशों और कठिनाइयों का सामना कर सकता है। आप का ख़ुत्बा (भाषण) “हम मुसलमान हैं” भी उतना ही महत्वपूर्ण है जिस में आप फ़रमाते हैं कि

“हम कष्टपूर्ण समय से गुज़र चुके हैं और अब हमें यह ख़बरें मिल रही हैं कि जहाँ कहीं भी अहमदियों की संख्या कम है और वे कमज़ोर हैं उनका बहिष्कार किया जा रहा है। वे खाने पीने की सामग्री नहीं ले सकते हैं। दुकानदारों से कहा जाता है कि उन्हें जीवन की अपरिहार्य आवश्यकताओं को भी न बेचें, और जल प्रबंधकों से कहा गया है कि वे पानी का प्रबंध न करें।

हमें इस बात की चिंता नहीं है कि हमें भूख से परेशान किया जा रहा है, क्योंकि पवित्र क़ुरआन में हमें इस बारे में चेतावनी दी गई  है :

“और हम अवश्य तुम्हें कुछ भय और कुछ भूख और कुछ धन और प्राणों और फलों की हानि के द्वारा आज़माएँगे।” (2:156)

जो सूचनाएं प्राप्त हो रहीं हैं उन से स्पष्ट होता है कि अब अहमदियों को खाने-पीने से वंचित करने पर बल दिया जा रहा है। इस प्रकार की सूचनाएं प्राप्त होने के बाद, मैं स्वयं को और उन लोगों को जो मुझ से संपर्क में हैं स्मरण करवाता हूँ कि हमारे प्रिय स्वामी ख़ात्मुल अंबिया हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को मक्का में रहते समय भी समस्त मुसलमानों के साथ शअब अबी तालिब नामक तंग घाटी में ढाई-तीन वर्ष तक कैद किया गया था। उन सब को अत्यंत कष्टपूर्ण अवस्था से आज़माया गया और उन्हें जीवन की आवश्यकताओं से रोका गया। अल्लाह ने ऐसे सामान प्रदान किए कि वे अत्यंत कष्टपूर्ण अवस्था में जीवन यापन के लिए आवश्यक सामग्री की प्राप्ति में सफ़ल हो गए।”

सोलह वर्ष तक ख़िलाफ़त के पद पर रहने और इस्लाम की विजय की ओर स्वर्णिम पग उठाने के बाद हज़रत हाफ़िज़ मिर्ज़ा नासिर अहमद साहब 9 जून 1982 ई० को मृत्यु को प्राप्त हो गए।

हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहब

हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद साहब का विवाह 07 फ़रवरी 1924 ई० को श्रीमती मरियम बेग़म साहिबा के साथ हुआ। आप के निकाह के समारोह में हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के एक सम्माननीय सहाबी हज़रत सय्यद सरवर शाह साहब ने फ़रमाया :

“मैं अब वृद्ध हो चुका हूँ और शीघ्र इस दुनिया से चल बसूँगा परन्तु जो लोग जीवित रहेंगे वे इस विवाह के परिणाम स्वरूप जन्म लेने वाले धर्म के सेवक देखेंगे जैसे पहले हुआ है। यह मेरा दृढ़ विश्वास है।”

यह धर्म के सेवक हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहब रहेमहुल्लाह 18 दिसम्बर 1928 ई० को क़ादियान में पैदा हुए। आप एक वास्तविक और नेक व्यक्ति के रूप में अपने प्रतिष्ठित पिता और श्रद्धावान माता के स्नेहपूर्ण लालन-पालन में बड़े हुए। आप को धार्मिक और सांसारिक ज्ञान में बहुत विस्तार प्राप्त था। ग्रेजुएशन के बाद आप ने जामिआ अहमदिया (धार्मिक संस्थान) से शाहिद की डिग्री प्राप्त की। फिर आप ने यूरोप से ढाई वर्ष तक धार्मिक शिक्षा ग्रहण की।

Hazrat Mirza Tahir Ahmad(rh)

09 जून 1982 ई० को हज़रत मिर्ज़ा नासिर अहमद साहब रहेमहुल्लाह की मृत्यु के बाद हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहब रहेमहुल्लाह हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के चौथे ख़लीफ़ा चयनित हुए। आप के मार्गदर्शन और ख़ुदाई सहायता से जमाअत उन्नति के मार्ग पर अग्रसर रही। प्रगति और उन्नति हर तरह से स्पष्ट थी। ज़मीनी, ऐतिहासिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह चतुर्थ की ख़िलाफ़त के समय में जमाअत का व्यापक प्रभाव हुआ और सभी लोग जमाअत में सम्मिलित हुए जिन में प्रसिद्ध व्यक्तित्व और कई क़बीले के बादशाह भी थे।

1987 ई० में दो नाइजीरियाई राजाओं ने बैअत (निष्ठा की प्रतिज्ञा) की और जमाअत में सम्मिलित हुए। इस प्रकार हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी “बादशाह तेरे कपड़ों से बरकत ढूँढेंगे” फिर से एक बार पूरी हुई।

आप ने इन दो बादशाहों को 1987 ई० में जलसा सालाना (वार्षिक सम्मेलन) लन्दन के अवसर पर हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम के तबर्रुकात (किसी महात्मा या बुज़ुर्ग का तोहफ़ा) प्रदान किए।

हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह चतुर्थ के मार्गदर्शन में सर्वप्रथम मुस्लिम टेलीवीज़न चैनल स्थापित हुआ। इस चैनल अर्थात मुस्लिम टेलीवीज़न अहमदिया (MTA) को दुनिया के पांच महाद्वीपों में करोड़ों लोग देखते हैं।

हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह चतुर्थ ने 1994 ई० में ह्यूमैनिटी फर्स्ट के नाम से एक मानवता के लिए कार्य करने वाले संगठन की स्थापना की। यह अंतर्राष्ट्रीय संगठन बिना किसी धर्म, देश, जाति अथवा नस्ल या राजनीती के भेद-भाव के ज़रूरतमंदों की सहयता करता है। इस संगठन के 53 देशों में रजिस्टर ऑफिस उपस्थित हैं।

हज़रत मिर्ज़ा ताहिर अहमद साहब रहेमहुल्लाह 19 अप्रैल 2003 ई० को मृत्यु को प्राप्त हो गए।

हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहब

आप का जन्म 15 सितंबर 1950 ई० को रब्वाह पाकिस्तान में हुआ। स्वर्गवासी हज़रत मिर्ज़ा मंसूर अहमद और नासिरा बेग़म के यहाँ आपका जन्म हुआ। 1977 ई० में फैसलाबाद पाकिस्तान के कृषि विश्वविद्यालय से कृषि अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री करने के बाद आपने अपने जीवन को इस्लाम की सेवा के लिए प्रस्तुत किया।

Hazrat Mirza Masroor Ahmad(at)

1977 ई० से 1985 ई० तक आप घाना (अफ्रीका) में विभिन्न कृषि परियोजना में और बहुत से शैक्षिक कार्यों में व्यस्त रहे और घाना के इतिहास में प्रथम बार वहां की ज़मीन में गेहूं की फ़सल उगाने का सफ़ल प्रयास किया। इसके बाद आप 1985 ई० में पाकिस्तान वापिस आए और 18 वर्षों तक जमाअत के विभिन्न पदों पर रहते हुए सेवा की जिस में नाज़िर आला व अमीर मक़ामी पाकिस्तान की। ज़िम्मेदारी भी सम्मिलित है। यह ज़िम्मेदारियां 1997 ई० से लेकर ख़लीफ़ा चयनित होने तक आप के ज़िम्मे रहीं।

हज़रत ख़लीफ़तुल मसीह चतुर्थ रहेमहुल्लाह की मृत्युपरांत हज़रत मिर्ज़ा मसरूर अहमद साहब अय्यदहुल्लाहु तआला बिनस्रिहिल अज़ीज़ को 22 अप्रैल 2003 ई० को हज़रत मसीह मौऊद अलैहिस्सलाम का पंचम ख़लीफ़ा चयनित किया गया और अब तक जमाअत अहमदिया के प्रबंधकीय और आध्यात्मिक सरदार के रूप में सेवा कर रहे हैं।